भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 2024

अमिततेजस्वी कुन्तीकुमार अर्जुनके इस प्रकार कहनेपर वृष्णिकुलनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने युद्धमें श्वेत घोड़ोंसे जुते हुए रथको आगे बढ़ाया ।। ४७ ।। निष्ठानको महानासीत् तव सैन्यस्य मारिष । यदर्जुनो रणे क्रुद्धः संयातास्तावकान् प्रति ।। ४८ ।। आर्य! रणभूमिमें क्रुद्ध हुए अर्जुन आपके सैनिकोंकी ओर जाने लगे, उस समय आपकी सेनामें बड़े जोरसे हाहाकार होने लगा ।। ४८ ।। समासाद्य तु कौन्तेयो राज्ञस्तान् भीष्मरक्षिणः । सुशर्माणमथो राजन्निदं वचनमब्रवीत् ।। ४९ ।। राजन्! कुन्तीकुमार अर्जुनने भीष्मकी रक्षा करनेवाले उन राजाओंके पास जाकर सुशर्मासे इस प्रकार कहा— ।। ४९ ।। जानामि त्वां युधां श्रेष्ठमत्यन्तं पूर्ववैरिणम् । अनयस्याद्य सम्प्राप्तं फलं पश्य सुदारुणम् ।। ५० ।। अद्य ते दर्शयिष्यामि पूर्वप्रेतान् पितामहान् । 'वीर! मैं जानता हूँ, तुम पाण्डवोंके पूर्ववैरी और योद्धाओंमें अत्यन्त उत्तम हो। तुमलोगोंने जो अन्याय किया है, उसका यह अत्यन्त भयंकर फल आज प्राप्त हुआ है, इसे देखो। आज मैं तुम्हें तुम्हारे पहलेके मरे हुए पितामहोंका दर्शन कराऊँगा' ।। ५० १/२ ।। एवं संजल्पतस्तस्य बीभत्सोः शत्रुघातिनः ।। ५१ ।। श्रुत्वापि परुषं वाक्यं सुशर्मा रथयूथपः । न चैनमब्रवीत् किंचिच्छुभं वा यदि वाशुभम् ।। ५२ ।। ऐसा कहते हुए शत्रुघाती अर्जुनके परुष वचनको सुनकर भी रथयूथपति सुशर्मा उनसे भला या बुरा कुछ भी न बोला ।। ५१-५२ ।। अभिगम्यार्जुनं वीरं राजभिर्बहुभिर्वृतः । पुरस्तात् पृष्ठतश्चैव पार्श्वतश्चैव सर्वतः ।। ५३ ।। परिवार्यार्जुनं संख्ये तव पुत्रैर्महारथः । शरैः संछादयामास मेघैरिव दिवाकरम् ।। ५४ ।। अनेक राजाओंसे घिरे हुए उस महारथीने आपके पुत्रोंको साथ ले युद्धमें वीर अर्जुनके सामने जाकर उन्हें आगे, पीछे और पार्श्वभाग—सब ओरसे घेर लिया और जैसे बादल सूर्यको ढक लेते हैं, उसी प्रकार बाणोंसे अर्जुनको आच्छादित कर दिया ।। ५३-५४ ।। ततः प्रवृत्तः सुमहान् संग्रामः शोणितोदकः । तावकानां च समरे पाण्डवानां च भारत ।। ५५ ।। भारत! तत्पश्चात् रणक्षेत्रमें आपके पुत्रों और पाण्डवोंमें खूनको पानीकी तरह बहानेवाला महान् संग्राम छिड़ गया ।। ५५ ।।