महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2030, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रभो! जैसे क्रोधमें भरे हुए दैत्यगण एकत्र हो देवताओंपर प्रहार करते हैं, उसी प्रकार कृपाचार्य, शल्य, शल तथा चित्रसेनने युद्धस्थलमें अत्यन्त क्रोधमें भरकर समस्त पाण्डवोंको अपने बाणोंसे घायल कर दिया ॥ १८ ॥
छिन्नायुधं शान्तनवेन राजा शिखण्डिनं प्रेक्ष्य च जातकोपः। अजातशत्रुः समरे महात्मा शिखण्डिनं क्रुद्ध उवाच वाक्यम् ॥ १९ ॥
शान्तनुनन्दन भीष्मने जब शिखण्डीका धनुष काट दिया,* तब समरांगणमें अजातशत्रु महात्मा युधिष्ठिर शिखण्डीकी ओर देखकर कुपित हो उठे और उससे क्रोधपूर्वक इस प्रकार बोले— ॥ १९ ॥
उक्त्वा तथा त्वं पितुरग्रतो मा- महं हनिष्यामि महाव्रतं तम् । भीष्मं शरौघैर्विमलार्कवर्णैः सत्यं वदामीति कृता प्रतिज्ञा ॥ २० ॥ त्वया च नैनां सफलां करोषि देवव्रतं यन्न निहंसि युद्धे । मिथ्याप्रतिज्ञो भव मात्र वीर रक्ष स्वधर्मं स्वकुलं यशश्च ॥ २१ ॥
‘वीर! तुमने अपने पिताके सामने प्रतिज्ञापूर्वक मुझसे यह कहा था कि ‘मैं महान् व्रतधारी भीष्मको निर्मल सूर्यके समान तेजस्वी बाणसमूहोंद्वारा अवश्य मार डालूँगा, यह बात मैं सत्य कहता हूँ।’ ऐसी प्रतिज्ञा तुमने की थी; परंतु तुम इस प्रतिज्ञाको सफल नहीं करते हो। कारण कि युद्धमें देवव्रत भीष्मका वध नहीं कर रहे हो। झूठी प्रतिज्ञा करनेवाला न बनो। अपने धर्म, कुल और यशकी रक्षा करो ॥ २०-२१ ॥
प्रेक्षस्व भीष्मं युधि भीमवेगं सर्वांस्तपन्तं मम सैन्यसंघान् । शरौघजालैरतितिग्मवेगैः कालं यथा कालकृतं क्षणेन ॥ २२ ॥
‘देखो! जैसे यमराज समयानुसार उपस्थित होकर क्षणभरमें देहधारीका विनाश कर देते हैं, उसी प्रकार ये युद्धमें भयंकर वेगशाली भीष्म अत्यन्त प्रचण्ड वेगवाले बाणसमूहोंके द्वारा मेरी समस्त सेनाओंको कितना संताप दे रहे हैं ॥ २२ ॥
निकृत्तचापः समरेऽनपेक्षः पराजितः शान्तनवेन चाजौ । विहाय बन्धूनथ सोदरांश्च