महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2037, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंआकाशे समदृश्यन्त खगमानां व्रजा इव ।। ७ ।। आर्य! इसी प्रकार भीष्मके चलाये हुए बाणसमूह भी आकाशमें पक्षियोंके झुंडके समान दिखायी देने लगे ।। ७ ।। निमेषार्धेन कौन्तेयं भीष्मः शान्तनवो युधि । अदृश्यं समरे चक्रे शरजालेन भागशः ।। ८ ।। शान्तनुनन्दन भीष्मने युद्धस्थलमें आधे निमेषमें ही पृथक्-पृथक् बाणोंका जाल-सा बिछाकर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको अदृश्य कर दिया ।। ८ ।। ततो युधिष्ठिरो राजा कौरव्यस्य महात्मनः । नाराचं प्रेषयामास क्रुद्ध आशीविषोपमम् ।। ९ ।। तब क्रोधमें भरे हुए राजा युधिष्ठिरने कुरुवंशी महात्मा भीष्मपर विषधर सर्पके समान नाराचका प्रहार किया ।। ९ ।। असम्प्राप्तं ततस्तं तु क्षुरप्रेण महारथः । चिच्छेद समरे राजन् भीष्मस्तस्य धनुश्च्युतम् ।। १० ।। राजन्! परंतु महारथी भीष्मने युधिष्ठिरके धनुषसे छूटे हुए उस नाराचको अपने पास पहुँचनेसे पहले ही समरभूमिमें एक क्षुरप्रद्वारा काट गिराया ।। १० ।। तं तु छित्त्वा रणे भीष्मो नाराचं कालसम्मितम् । निजघ्ने कौरवेन्द्रस्य हयान् काञ्चनभूषणान् ।। ११ ।। इस प्रकार रणभूमिमें कालके समान भयंकर उस नाराचको काटकर भीष्मने कौरवराज युधिष्ठिरके सुवर्णाभूषणोंसे युक्त घोड़ोंको मार डाला ।। ११ ।। (हताश्वे तु रथे तिष्ठन् शक्तिं चिक्षेप धर्मराट् । तामापतन्तीं सहसा कालपाशोपमां शिताम् ।। चिच्छेद समरे भीष्मः शरैः संनतपर्वभिः ।।) घोड़ोंके मारे जानेपर भी उसी रथमें खड़े हुए धर्मराज युधिष्ठिरने भीष्मपर शक्ति चलायी। कालपाशके समान तीखी एवं भयंकर उस शक्तिको सहसा अपनी ओर आती देख भीष्मने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा उसे रणभूमिमें काट गिराया। हताश्वं तु रथं त्यक्त्वा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । आरुरोह रथं तूर्णं नकुलस्य महात्मनः ।। १२ ।। तदनन्तर जिसके घोड़े मारे गये थे, उस रथको त्यागकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर तुरंत ही महामना नकुलके रथपर आरूढ़ हो गये ।। १२ ।। यमावपि हि संक्रुद्धः समासाद्य रणे तदा । शरैः संछादयामास भीष्मः परपुरंजयः ।। १३ ।। उस समय रणक्षेत्रमें नकुल और सहदेवको पाकर शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले भीष्मने अत्यन्त कुपित हो उन्हें बाणोंसे आच्छादित कर दिया ।। १३ ।।