महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2039, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंभीष्म उस युद्धस्थलमें रथियोंके मस्तक काट-काटकर उसी प्रकार गिराने लगे, जैसे कोई कुशल मनुष्य ताड़के वृक्षोंसे पके हुए फलोंको गिरा रहा हो ॥ २१ ॥ पतद्भिश्च महाराज शिरोभिर्धरणीतले । बभूव तुमुलः शब्दः पततामश्मनामिव ॥ २२ ॥ महाराज! भूतलपर पटापट गिरते हुए मस्तकोंका आकाशसे पृथ्वीपर पड़नेवाले पत्थरोंके समान भयंकर शब्द हो रहा था ॥ २२ ॥ तस्मिन् सुतुमुले युद्धे वर्तमाने भयानके । सर्वेषामेव सैन्यानामासीद् व्यतिकरो महान् ॥ २३ ॥ उस भयानक तुमुल युद्धके होते समय सभी सेनाओंका आपसमें भारी संघर्ष हो गया ॥ २३ ॥ भिन्नेषु तेषु व्यूहेषु क्षत्रिया इतरेतरम् । एकमेकं समाहूय युद्धायैवावतस्थिरे ॥ २४ ॥ उन सबका व्यूह भंग हो जानेपर भी सम्पूर्ण क्षत्रिय परस्पर एक-एकको ललकारते हुए युद्धके लिये डटे ही रहे ॥ २४ ॥ शिखण्डी तु समासाद्य भरतानां पितामहम् । अभिदुद्राव वेगेन तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ २५ ॥ शिखण्डी भरतवंशके पितामह भीष्मके पास पहुँचकर उनकी ओर बड़े वेगसे दौड़ा और बोला—‘खड़ा रह, खड़ा रह’ ॥ २५ ॥ अनादृत्य ततो भीष्मस्तं शिखण्डिनमाहवे । प्रययौ सृंजयान् क्रुद्धः स्त्रीत्वं चिन्त्य शिखण्डिनः ॥ २६ ॥ किंतु भीष्मने शिखण्डीके स्त्रीत्वका चिन्तन करके युद्धमें उसकी अवहेलना कर दी और सृंजयवंशी क्षत्रियोंपर क्रोधपूर्वक आक्रमण किया ॥ २६ ॥ सृंजयास्तु ततो दृष्ट्वा हृष्टं भीष्मं महारणे । सिंहनादांश्च विविधांश्चक्रुः शङ्खविमिश्रितान् ॥ २७ ॥ तब सृंजयगण उस महायुद्धमें हर्ष और उत्साहसे भरे हुए भीष्मको देखकर शंखध्वनिके साथ नाना प्रकारसे सिंहनाद करने लगे ॥ २७ ॥ ततः प्रवृत्ते युद्धं व्यतिषक्तरथद्विपम् । पश्चिमां दिशमासाद्य स्थिते सवितरि प्रभो ॥ २८ ॥ प्रभो! जब सूर्य पश्चिम दिशामें ढलने लगे, उस समय युद्धका रूप और भी भयंकर हो गया। रथ-से-रथ और हाथी-से-हाथी भिड़ गये ॥ २८ ॥ धृष्टद्युम्नोऽथ पाञ्चाल्यः सात्यकिश्च महारथः । पीडयन्तौ भृशं सैन्यं शक्तितोमरवृष्टिभिः ॥ २९ ॥