महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2042, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंचारों ओर राक्षस, पिशाच तथा अन्य मांसाहारी जन्तु सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें दिखायी देने लगे ॥ ४५ ॥ अर्जुनोऽथ सुशर्माणं राज्ञस्तान् सपदानुगान् । विजित्य पृतनामध्ये ययौ स्वशिविरं प्रति ॥ ४६ ॥ तदनन्तर अर्जुन राजा दुर्योधनके पीछे चलनेवाले सुशर्मा आदिको सेनामें पराजित करके अपने शिविरको चले गये ॥ युधिष्ठिरोऽपि कौरव्यो भ्रातृभ्यां सहितस्तथा । ययौ स्वशिविरं राजा निशायां सेनया वृतः ॥ ४७ ॥ तथा सेनासे घिरे हुए कुरुकुलनन्दन राजा युधिष्ठिर भी दोनों भाई नकुल-सहदेवके साथ रातमें अपने शिविरमें पधारे ॥ ४७ ॥ भीमसेनोऽपि राजेन्द्र दुर्योधनमुखान् रथान् । अवजित्य ततः संख्ये ययौ स्वशिविरं प्रति ॥ ४८ ॥ राजेन्द्र! तब भीमसेन भी दुर्योधन आदि रथियोंको युद्धमें जीतकर अपने शिविरको लौट गये ॥ ४८ ॥ दुर्योधनोऽपि नृपतिः परिवार्य महारणे । भीष्मं शान्तनवं तूर्णं प्रयातः शिविरं प्रति ॥ ४९ ॥ राजा दुर्योधन भी महायुद्धमें शान्तनुनन्दन भीष्मको घेरकर तुरंत ही अपने शिविरको लौट गया ॥ ४९ ॥ द्रोणो द्रौणिः कृपः शल्यः कृतवर्मा च सात्वतः । परिवार्य चमूं सर्वां प्रययुः शिविरं प्रति ॥ ५० ॥ द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, शल्य तथा यदुवंशी कृतवर्मा—ये सारी सेनाको घेरकर अपने शिविरकी ओर चल दिये ॥ ५० ॥ तथैव सात्यकी राजन् धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । परिवार्य रणे योधान् ययतुः शिविरं प्रति ॥ ५१ ॥ राजन्! इसी प्रकार सात्यकि और द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न भी युद्धमें अपने योद्धाओंको घेरकर शिविरकी ओर प्रस्थित हुए ॥ ५१ ॥ एवमेते महाराज तावकाः पाण्डवैः सह । पर्यवर्तन्त सहिता निशाकाले परंतप ॥ ५२ ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले महाराज! इस प्रकार रातके समय आपके योद्धा पाण्डवोंके साथ अपने-अपने शिविरमें लौट आये ॥ ५२ ॥ ततः स्वशिविरं गत्वा पाण्डवाः कुरवस्तथा । न्यवसन्त महाराज पूजयन्तः परस्परम् ॥ ५३ ॥