भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 2048, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 2048

तेऽन्योन्यं समरे सेने युध्यमाने नराधिप ॥ ३१ ॥
अशोभेतां यथा देवदैत्यसेने समुद्यते ।
नरेश्वर! दोनों पक्षोंकी सेनाएँ समरभूमिमें एक-दूसरीसे जूझ रही थीं। उस समय परस्पर युद्धके लिये उद्यत हुई देवसेना और दैत्यसेनाके समान उनकी शोभा हो रही थी ॥ ३१ ½ ॥
अभ्यद्रवन्त समरे तेऽन्योन्यं वै समन्ततः ॥ ३२ ॥
वे कौरव-पाण्डव सैनिक सब ओर समरांगणमें एक-दूसरेपर धावा करने लगे ॥ ३२ ॥
रथास्तु रथिभिस्तूर्णं प्रेषिताः परमाहवे ।
युगैर्युगानि संश्लिष्य युयुधुः पार्थिवर्षभाः ॥ ३३ ॥
रथी अपने रथोंको तुरंत ही उस महायुद्धमें दौड़ाकर ले आये। श्रेष्ठ नरेश रथके जुओंसे जुए भिड़ाकर युद्ध करने लगे ॥ ३३ ॥
दन्तिनां युध्यमानानां संघर्षात् पावकोऽभवत् ।
दन्तेषु भरतश्रेष्ठ सधूमः सर्वतोदिशम् ॥ ३४ ॥
भरतश्रेष्ठ! सम्पूर्ण दिशाओंमें परस्पर जूझते हुए दन्तार हाथियोंके दाँतोंके आपसमें टकरानेसे उनमें धूमसहित अग्नि प्रकट हो जाती थी ॥ ३४ ॥
प्रासैरभिहताः केचिद् गजयोधाः समन्ततः ।
पतमानाः स्म दृश्यन्ते गिरिशृङ्गान्नगा इव ॥ ३५ ॥
कितने ही हाथीसवार प्रासोंसे घायल होकर पर्वतशिखरसे गिरनेवाले वृक्षोंके समान सब ओर हाथियोंकी पीठोंसे गिरते दिखायी देते थे ॥ ३५ ॥
पादाताश्चाप्यदृश्यन्त निघ्नन्तोऽथ परस्परम् ।
चित्ररूपधराः शूरा नखरप्रासयोधिनः ॥ ३६ ॥
बघनखों एवं प्रासोंद्वारा युद्ध करनेवाले शूरवीर पैदल सैनिक एक-दूसरेपर प्रहार करते हुए विचित्र रूपधारी दिखायी देते थे ॥ ३६ ॥
अन्योन्यं ते समासाद्य कुरुपाण्डवसैनिकाः ।
अस्त्रैर्नानाविधैर्घोरै रणे निन्युर्यमक्षयम् ॥ ३७ ॥
इस प्रकार कौरव तथा पाण्डव-सैनिक रणक्षेत्रमें एक-दूसरेसे भिड़कर नाना प्रकारके भयंकर अस्त्रोंद्वारा विपक्षियोंको यमलोक पहुँचाने लगे ॥ ३७ ॥
ततः शान्तनवो भीष्मो रथघोषेण नादयन् ।
अभ्यागमद् रणे पार्थान् धनुःशब्देन मोहयन् ॥ ३८ ॥
इतनेहीमें शान्तनुनन्दन भीष्म अपने रथकी घर-घराहटसे सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजाते और धनुषकी टंकारसे लोगोंको मूर्च्छित करते हुए समरभूमिमें पाण्डव-सैनिकोंपर चढ़ आये ॥ ३८ ॥
पाण्डवानां रथाश्चापि नदन्तो भैरवं स्वनम् ।
अभ्यद्रवन्त संयत्ता धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ॥ ३९ ॥

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