भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 2054, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 2054

ततो दुर्योधनो राजा भ्रातृव्यसनकर्शितः । अब्रवीत् तावकान् योधान् भीमोऽयं युधि वध्यताम् ॥ ३१ ॥ भाइयोंके मरनेसे राजा दुर्योधनको बड़ा कष्ट हुआ। अतः उसने आपके समस्त सैनिकोंको आज्ञा दी कि इस भीमसेनको युद्धमें मार डालो ॥ ३१ ॥

एवमेते महेष्वासाः पुत्रास्तव विशाम्पते । भ्रातॄन् संदृश्य निहतान् प्रास्मरंस्ते हि तद् वचः ॥ ३२ ॥ यदुक्तवान् महाप्राज्ञः क्षत्ता हितमनामयम् । तदिदं समनुप्राप्तं वचनं दिव्यदर्शिनः ॥ ३३ ॥ प्रजानाथ! इस प्रकार ये आपके महाधनुर्धर पुत्र अपने भाइयोंको मारा गया देख उन बातोंकी याद करने लगे, जिन्हें महाज्ञानी विदुरने कहा था। वे सोचने लगे—दिव्यदर्शी विदुरने हमारे कुशल एवं हितके लिये जो बात कही थी, वह आज सिरपर आ गयी ॥ ३२-३३ ॥

लोभमोहसमाविष्टः पुत्रप्रीत्या जनाधिप । न बुध्यसे पुरा यत् तत् तथ्यमुक्तं वचो महत् ॥ ३४ ॥ जनेश्वर! आपने अपने पुत्रोंके प्रति प्रेमके कारण लोभ और मोहके वशीभूत हो, विदुरने पहले जो सत्य एवं हितकी महत्त्वपूर्ण बात बतायी थी, उसपर ध्यान नहीं दिया ॥ ३४ ॥

तथैव च वधार्थाय पुत्राणां पाण्डवो बली । नूनं जातो महाबाहुर्यथा हन्ति स्म कौरवान् ॥ ३५ ॥ उनके कथनानुसार ही बलवान् पाण्डुपुत्र महाबाहु भीम आपके पुत्रोंके वधका कारण बनते जा रहे हैं और उसी प्रकार वे कौरवोंका सर्वनाश कर रहे हैं ॥ ३५ ॥

ततो दुर्योधनो राजा भीष्ममासाद्य संयुगे । दुःखेन महताऽऽविष्टो विललाप सुदुःखितः ॥ ३६ ॥ उस समय राजा दुर्योधन युद्धभूमिमें भीष्मके पास जाकर महान् दुःखसे व्याप्त एवं अत्यन्त शोकमग्न होकर विलाप करने लगा— ॥ ३६ ॥

निहता भ्रातरः शूरा भीमसेनेन मे युधि । यतमानास्तथान्येऽपि हन्यन्ते सर्वसैनिकाः ॥ ३७ ॥ ‘पितामह! भीमसेनेन युद्धमें मेरे शूरवीर बन्धुओंको मार डाला और दूसरे भी समस्त सैनिक विजयके लिये पूर्ण प्रयत्न करते हुए भी असफल हो उनके हाथसे मारे जा रहे हैं ॥ ३७ ॥

भवांश्च मध्यस्थतया नित्यमस्मानुपेक्षते । सोऽहं कुपथमारूढः पश्य दैवमिदं मम ॥ ३८ ॥ ‘आप मध्यस्थ बने रहनेके कारण सदा हम-लोगोंकी उपेक्षा करते हैं। मैं बड़े बुरे मार्गपर चढ़ आया। मेरे इस दुर्भाग्यको देखिये’ ॥ ३८ ॥