महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2073, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंभारत! हमने उस युद्धमें भीष्मका इन्द्रके समान अत्यन्त अद्भुत पराक्रम देखा था॥ ८७॥ तथैव भीमसेनस्य पार्षतस्य च भारत । रौद्रमासीद् रणे युद्धं सात्यकस्य च धन्विनः ॥ ८८ ॥ भरतनन्दन! इसी प्रकार उस रणक्षेत्रमें भीमसेन, धृष्टद्युम्न तथा धनुर्धर सात्यकिका भयानक युद्ध चल रहा था॥ ८८॥ दृष्ट्वा द्रोणस्य विक्रान्तं पाण्डवान् भयमाविशत् । एक एव रणे शक्तो निहन्तुं सर्वसैनिकान् ॥ ८९ ॥ किं पुनः पृथिवीशूरैर्योधव्रातैः समावृतः । इत्यब्रुवन् महाराज रणे द्रोणेन पीडिताः ॥ ९० ॥ द्रोणाचार्यका पराक्रम देखकर तो पाण्डवोंके मनमें भय समा गया। महाराज! वे युद्धस्थलमें द्रोणाचार्यसे पीड़ित होकर कहने लगे कि 'रणभूमिमें अकेले द्रोणाचार्य ही समस्त सैनिकोंको मार डालनेकी शक्ति रखते हैं। फिर जब ये भूमण्डलके सुविख्यात शूरवीर योद्धाओंके समुदायोंसे घिरे हुए हैं, तब तो इनकी विजयके लिये कहना ही क्या है?'॥ ८९-९०॥ वर्तमाने तथा रौद्रे संग्रामे भरतर्षभ । उभयोः सेनयोः शूरा नामृष्यन्त परस्परम् ॥ ९१ ॥ भरतश्रेष्ठ! उस भयंकर संग्राममें दोनों सेनाओंके शूरवीर एक-दूसरेका उत्कर्ष नहीं सह सके॥ ९१॥ आविष्टा इव युध्यन्ते रक्षोभूता महाबलाः । तावकाः पाण्डवेयाश्च संरब्धास्तात धन्विनः ॥ ९२ ॥ तात! आपके और पाण्डवपक्षके महाबली धनुर्धर वीर भूतोंसे आविष्ट-से होकर राक्षसोंके समान बनकर क्रोधपूर्वक एक-दूसरेसे जूझ रहे थे॥ ९२॥ न स्म पश्यामहे कंचित् प्राणान् यः परिरक्षति । संग्रामे दैत्यसंकाशे तस्मिन् वीरवरक्षये ॥ ९३ ॥ बड़े-बड़े वीरोंका विनाश करनेवाले उस दैत्योंके तुल्य संग्राममें हमने किसीको ऐसा नहीं देखा जो अपने प्राणोंकी रक्षा कर रहा हो॥ ९३॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि इरावद्वधे नवतितमोऽध्यायः॥ ९०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें इरावान्का वधविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९०॥