भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 2081, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 2081

कुञ्जरं गिरिसंकाशं राक्षसं प्रत्यचोदयत् ॥ ७ ॥ महाबाहु घटोत्कच आपके पुत्रको मार डालनेकी इच्छासे वह शक्ति ऊपरको उठा रहा था। उसे उठी हुई देख वंगदेशके राजाने बड़ी उतावलीके साथ अपने पर्वताकार गजराजको उस राक्षसकी ओर बढ़ाया ॥ ७ ॥ स नागप्रवरेणाजौ बलिना शीघ्रगामिना । यतो दुर्योधनरथस्तं मार्गं प्रत्यवर्तत ॥ ८ ॥ वे वंगनरेश उस शीघ्रगामी महाबली गजराजपर आरूढ़ हो युद्धके मैदानमें उसी मार्गपर चले जहाँ दुर्योधनका रथ खड़ा था ॥ ८ ॥ रथं च वारयामास कुञ्जरेण सुतस्य ते । मार्गमावारितं दृष्ट्वा राज्ञा वङ्गेन धीमता ॥ ९ ॥ घटोत्कचो महाराज क्रोधसंरक्तलोचनः । उन्होंने अपने हाथीके द्वारा आपके पुत्रका मार्ग रोक दिया। महाराज! बुद्धिमान् वंगनरेशके द्वारा दुर्योधनके रथका मार्ग रुका हुआ देख घटोत्कचके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये ॥ ९ १/२ ॥ उद्यतां तां महाशक्तिं तस्मिंश्चिक्षेप वारणे ॥ १० ॥ स तयाभिहतो राजंस्तेन बाहुप्रमुक्तया । संजातरुधिरोत्पीडः पपात च ममार च ॥ ११ ॥ उसने उस उठायी हुई महाशक्तिको उस हाथीपर ही चला दिया। राजन्! घटोत्कचकी भुजाओंसे छूटी हुई उस शक्तिके आघातसे हाथीका कुम्भस्थल फट गया और उससे रक्तका स्रोत बहने लगा। फिर वह तत्काल ही भूमिपर गिरा और मर गया ॥ १०-११ ॥ पतत्यथ गजे चापि वङ्गानामिश्वरो बली । जवेन समभिद्रुत्य जगाम धरणीतलम् ॥ १२ ॥ हाथीके गिरते समय बलवान् वंगनरेश उसकी पीठसे वेगपूर्वक कूदकर धरतीपर आ गये ॥ १२ ॥ दुर्योधनोऽपि सम्प्रेक्ष्य पतितं वरवारणम् । प्रभग्नं च बलं दृष्ट्वा जगाम परमां व्यथाम् ॥ १३ ॥ उस श्रेष्ठ गजराजको गिरा हुआ देख सारी कौरवसेना भाग खड़ी हुई। यह सब देखकर दुर्योधनके मनमें बड़ी व्यथा हुई ॥ १३ ॥ (अशक्तः प्रतियोद्धुं वै दृष्ट्वा तस्य पराक्रमम् ।) क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य आत्मनश्चाभिमानिताम् । प्राप्तेऽपक्रमणे राजा तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ १४ ॥ वह घटोत्कचके पराक्रमपर दृष्टिपात करके उसका सामना करनेमें असमर्थ हो गया। क्षत्रियधर्म तथा अपने अभिमानको सामने रखकर पलायनका अवसर प्राप्त होनेपर भी