भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 2083, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 2083

भीष्मकी यह बात सुनकर सब महारथी उत्तम वेगका आश्रय ले बड़ी उतावलीके साथ उस स्थानपर गये, जहाँ कुरुराज दुर्योधन मौजूद था ।। २२ ।। द्रोणश्च सोमदत्तश्च बाह्लीकोऽथ जयद्रथः । कृपो भूरिश्रवाः शल्य आवन्त्यः सबृहद्बलः ।। २३ ।। अश्वत्थामा विकर्णश्च चित्रसेनो विविंशतिः । रथाश्चानेकसाहस्रा ये तेषामनुयायिनः ।। २४ ।। अभिद्रुतं परीप्सन्तः पुत्रं दुर्योधनं तव । तदनीकमनाधृष्यं पालितं तु महारथैः ।। २५ ।। द्रोणाचार्य, सोमदत्त, बाह्लीक, जयद्रथ, कृपाचार्य, भूरिश्रवा, शल्य, अवन्तीका राजकुमार, बृहद्बल, अश्वत्थामा, विकर्ण, चित्रसेन, विविंशति तथा उनके अनुयायी अनेक सहस्र रथी—ये सब लोग राक्षसके द्वारा आक्रान्त हुए आपके पुत्र दुर्योधनकी रक्षा करनेके लिये गये। उन महारथियोंसे पालित होकर वह सेना अजेय हो गयी ।। २३—२५ ।। आततायिनमायान्तं प्रेक्ष्य राक्षससत्तमः । नाकम्पत महाबाहुर्मैनाक इव पर्वतः ।। २६ ।। युद्धमें आततायी दुर्योधनको आते देख राक्षसशिरोमणि महाबाहु घटोत्कच मैनाक पर्वतकी भाँति अविचलभावसे खड़ा रहा ।। २६ ।। प्रगृह्य विपुलं चापं ज्ञातिभिः परिवारितः । शूलमुद्गरहस्तैश्च नानाप्रहरणैरपि ।। २७ ।। उसके जाति-बन्धु हाथोंमें शूल, मुद्गर आदि नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर उसे सब ओरसे घेरे हुए थे और उसने एक विशाल धनुष ले रखा था ।। २७ ।। ततः समभवद् युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् । राक्षसानां च मुख्यस्य दुर्योधनबलस्य च ।। २८ ।। तदनन्तर राक्षसशिरोमणि घटोत्कच तथा दुर्योधनकी सेनामें रोमांचकारी एवं भयंकर युद्ध होने लगा ।। २८ ।। धनुषां कूजतां शब्दः सर्वतस्तुमुलो रणे । अश्रूयत महाराज वंशानां दह्यतामिव ।। २९ ।। महाराज! रणभूमिमें सब ओर बाँसोंके दग्ध होनेके समान धनुषोंकी टंकारका भयंकर शब्द सुनायी देने लगा ।। २९ ।। अस्त्राणां पात्यमानानां कवचेषु शरीरिणाम् । शब्दः समभवद् राजन् गिरीणामिव भिद्यताम् ।। ३० ।। राजन्! देहधारियोंके कवचोंपर पड़नेवाले अस्त्रोंका ऐसा शब्द होता था, मानो पर्वत विदीर्ण हो रहे हों ।। ३० ।। वीरबाहुविसृष्टानां तोमराणां विशाम्पते ।

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