भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 2090, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 2090

तेषामापततां श्रुत्वा शब्दं तं तावकं बलम् । भीमसेनभयोद्विग्नं विवर्णवदनं तथा ॥ १८ ॥ उन सबके आनेसे जो कोलाहल हुआ, उसे सुनकर भीमसेनके भयसे उद्विग्न हुए आपके सैनिकोंका मुख उदास हो गया ॥ १८ ॥ परिवृत्तं महाराज परित्यज्य घटोत्कचम् । ततः प्रवृत्ते युद्धं तत्र तेषां महात्मनाम् ॥ १९ ॥ तावकानां परेषां च संग्रामेष्वनिवर्तिनाम् । महाराज! उस समय रक्षकोंद्वारा सब ओरसे घिरे हुए घटोत्कचको छोड़कर संग्राममें कभी पीठ न दिखानेवाले आपके तथा शत्रुपक्षके उन महामनस्वी योद्धाओंमें भारी युद्ध छिड़ गया ॥ १९ १/२ ॥ नानारूपाणि शस्त्राणि विसृजन्तो महारथाः ॥ २० ॥ अन्योन्यमभिधावन्तः सम्प्रहारं प्रचक्रिरे । नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंको छोड़ते और एक-दूसरेकी ओर दौड़ते हुए उभय पक्षके महारथी भीषण युद्ध करने लगे ॥ २० १/२ ॥ व्यतिषक्तं महारौद्रं युद्धं भीरुभयावहम् ॥ २१ ॥ हया गजैः समाजग्मुः पादाता रथिभिः सह । धीरे-धीरे अत्यन्त भयंकर युद्ध छिड़ गया, जो भीरु मनुष्योंको डरानेवाला था। घुड़सवार हाथीसवारोंके और पैदल रथियोंके साथ भिड़ गये ॥ २१ १/२ ॥ अन्योन्यं समरे राजन् प्रार्थयानाः समभ्ययुः ॥ २२ ॥ सहसा चाभवत् तीव्रं संनिपातान्महद् रजः । गजाश्वरथपत्तीनां पदनेमिसमुद्धतम् ॥ २३ ॥ राजन्! वे समरांगणमें एक-दूसरेको ललकारते हुए जूझ रहे थे। उस समय उस भीषण संघर्षसे सहसा बड़े जोरकी धूल उठी, जो हाथी, घोड़े और पैदलोंके पैरों तथा रथके पहियोंके धक्केसे उठायी गयी थी ॥ धूम्रारुणं रजस्तीव्रं रणभूमिं समावृणोत् । नैव स्वे न परे राजन् समज store? -> समजstore? No, समजानन् परस्परम् ॥ २४ ॥ महाराज! काले और लाल रंगकी उस दुःसह धूलने समस्त रणभूमिको ढक लिया। उस समय अपने और शत्रुपक्षके योद्धा एक-दूसरेको पहचान नहीं पाते थे ॥ २४ ॥ पिता पुत्रं न जानीते पुत्रो वा पितरं तथा । निर्मर्यादे तथाभूते वैशसे लोमहर्षणे ॥ २५ ॥ उस मर्यादाशून्य रोमांचकारी जनसंहारमें पिता पुत्रको और पुत्र पिताको नहीं पहचान पाता था ॥ २५ ॥ शस्त्राणां भरतश्रेष्ठ मनुष्याणां च गर्जताम् ।