भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 2106

उस हाथीको आते देख भीमसेन आदि पाण्डव महारथी शीघ्रतापूर्वक उसके चारों ओर खड़े हो गये ।। ३९ ।।
केकयाश्चाभिमन्युश्च द्रौपदेयाश्च सर्वशः ।
दशार्णाधिपतिः शूरः क्षत्रदेवश्च मारिष ।। ४० ।।
चेदिपश्चित्रकेतुश्च संरब्धाः सर्व एव ते ।
उत्तमास्त्राणि दिव्यानि दर्शयन्तो महाबलाः ।। ४१ ।।
तमेकं कुञ्जरं क्रुद्धाः समन्तात् पर्यवारयन् ।
आर्य! केकयराजकुमार, अभिमन्यु, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, शूरवीर दशार्णराज, क्षत्रदेव, चेदिराज धृष्टकेतु तथा चित्रकेतु—ये सभी महाबली वीर रोषावेशमें भरकर अपने उत्तम दिव्यास्त्रोंका प्रदर्शन करते हुए उस एकमात्र हाथीको क्रोधपूर्वक चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ।। ४०-४१ १/२ ।।
स विद्धो बहुभिर्बाणैर्व्यरोचत महाद्विपः ।। ४२ ।।
संजातरुधिरोत्पीडो धातुचित्र इवाद्रिराट् ।
अनेक बाणोंसे घायल हुआ वह महान् गज रक्तरंजित होकर गेरु आदि धातुओंसे विचित्र दिखायी देनेवाले गिरिराजके समान सुशोभित हुआ ।। ४२ १/२ ।।
दशार्णाधिपतिश्चापि गजं भूमिधरोपमम् ।। ४३ ।।
समास्थितोऽभिदुद्राव भगदत्तस्य वारणम् ।
तदनन्तर दशार्णदेशके राजा भी एक पर्वताकार हाथीपर आरूढ़ हो भगदत्तके हाथीकी ओर बढ़े ।। ४३ १/२ ।।
तमापतन्तं समरे गजं गजपतिः स च ।। ४४ ।।
दधार सुप्रतीकोऽपि वेलेव मकरालयम् ।
समरभूमिमें अपनी ओर आते हुए उस हाथीको गजराज सुप्रतीकने उसी प्रकार रोक दिया, जैसे तटकी भूमि समुद्रको आगे बढ़नेसे रोके रहती है ।। ४४ १/२ ।।
वारितं प्रेक्ष्य नागेन्द्रं दशार्णस्य महात्मनः ।। ४५ ।।
साधु साध्विति सैन्यानि पाण्डवेयान्यपूजयन् ।
महामना दशार्णनरेशके गजराजको रोका गया देख समस्त पाण्डव सैनिक भी साधु-साधु कहकर सुप्रतीककी प्रशंसा करने लगे ।। ४५ १/२ ।।
ततः प्राग्ज्योतिषः क्रुद्धस्तोमरान् वै चतुर्दश ।। ४६ ।।
प्राहिणोत् तस्य नागस्य प्रमुखे नृपसत्तम ।
नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर प्राग्ज्योतिषनरेशने कुपित होकर दशार्णनरेशके हाथीको सामनेसे चौदह तोमर मारे ।। ४६ १/२ ।।
वर्म मुख्यं तनुत्राणं शातकुम्भपरिष्कृतम् ।। ४७ ।।
विदार्य प्राविशन् क्षिप्रं वल्मीकमिव पन्नगाः ।