भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 2109

रुक्मदण्डां महाशक्तिं जग्राहाग्निशिखोपमाम् । चिक्षेप तां राक्षसस्य तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ ६४ ॥ त्रिशूलको दो टुकड़ोंमें कटकर गिरा हुआ देख राजा भगदत्तने आगकी लपटोंसे वेष्टित तथा सुवर्णमय दण्डसे विभूषित एक महाशक्ति हाथमें ली और उसे राक्षसपर चला दिया। फिर वे बोले—खड़ा रह, खड़ा रह ॥ ६३-६४ ॥

तामापतन्तीं सम्प्रेक्ष्य वियत्स्थामशनीमिव । उत्पत्य राक्षसस्तूर्णं जग्राह च ननाद च ॥ ६५ ॥ आकाशमें प्रकाशित होनेवाली अशनि (वज्र)-के समान उस महाशक्तिको गिरती हुई देख राक्षस घटोत्कचने उछलकर तुरंत ही उसे पकड़ लिया और सिंहके समान गर्जना की ॥ ६५ ॥

बभञ्ज चैनां त्वरितो जानुन्यारोप्य भारत । पश्यतः पार्थिवेन्द्रस्य तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ६६ ॥ भारत! फिर उसने तुरंत ही राजा भगदत्तके देखते-देखते उस शक्तिको घुटनेपर रखकर तोड़ डाला। वह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥ ६६ ॥

तदवेक्ष्य कृतं कर्म राक्षसेन बलीयसा । दिवि देवाः सगन्धर्वा मुनयश्चापि विस्मिताः ॥ ६७ ॥ महाबली राक्षसके द्वारा किये गये इस महान् कर्मको देखकर आकाशमें खड़े हुए देवता, गन्धर्व और मुनि बड़े विस्मित हुए ॥ ६७ ॥

पाण्डवाश्च महाराज भीमसेनपुरोगमाः । साधु साध्विति नादेन पृथिवीमन्वनादयन् ॥ ६८ ॥ महाराज! उस समय भीमसेन आदि पाण्डवोंने वाह-वाह कहते हुए अपने सिंहनादसे पृथ्वीको गुँजा दिया ॥ ६८ ॥

तं तु श्रुत्वा महानादं प्रहृष्टानां महात्मनाम् । नामृष्यत महेष्वासो भगदत्तः प्रतापवान् ॥ ६९ ॥ हर्षमें भरे हुए उन महामना वीरोंका महान् सिंहनाद सुनकर महाधनुर्धर एवं प्रतापी राजा भगदत्त न सह सके ॥ ६९ ॥

स विस्फार्य महच्चापमिन्द्राशनिसमप्रभम् । तर्जयामास वेगेन पाण्डवानां महारथान् ॥ ७० ॥ उन्होंने इन्द्रके वज्रकी भाँति प्रकाशित होनेवाले अपने विशाल धनुषको खींचकर पाण्डव महारथियोंको वेगपूर्वक डाँट बतायी ॥ ७० ॥

विसृजन् विमलांस्तीक्ष्णान् नाराचाञ्ज्वलनप्रभान् । भीममेकेन विव्याध राक्षसं नवभिः शरैः ॥ ७१ ॥