भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 2126, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 2126

न पार्थान् प्रतिबाधन्ते न जाने तच्च कारणम् ॥ ४ ॥ ‘मित्रो! द्रोणाचार्य, भीष्म, कृपाचार्य, शल्य तथा भूरिश्रवा—ये लोग युद्धमें कुन्तीके पुत्रोंको कभी कोई बाधा नहीं पहुँचाते हैं। इसका क्या कारण है, यह मैं नहीं जानता ॥ ४ ॥ अवध्यमानास्ते चापि क्षपयन्ति बलं मम । सोऽस्मि क्षीणबलः कर्ण क्षीणशस्त्रश्च संयुगे ॥ ५ ॥ ‘वे पाण्डव स्वयं अवध्य रहकर मेरी सेनाका संहार कर रहे हैं। कर्ण! इस प्रकार मेरी सेना तथा अस्त्र-शस्त्रोंका युद्धमें क्षय होता चला जा रहा है ॥ ५ ॥ (त्वयि युद्धविमुखे चापि जितश्चास्मि हि पाण्डवैः । द्रोणस्य प्रमुखे वीरा हतास्ते भ्रातरो मम ॥ भीमसेनेन राधेय मम चैवानुपश्यतः ।) ‘राधानन्दन! तुम युद्धसे मुँह मोड़कर बैठ रहे हो, इसलिये पाण्डवोंने मुझे परास्त कर दिया। द्रोणाचार्यके सामने ही मेरे देखते-देखते भीमसेनने मेरे वीर भाइयोंको मार डाला। निकृतः पाण्डवैः शूरैरवध्यैर्दैवतैरपि । सोऽहं संशयमापन्नः प्रहरिष्ये कथं रणे ॥ ६ ॥ ‘पाण्डव शूरवीर और देवताओंके लिये भी अवध्य हैं। उनके द्वारा पराजित होकर मैं जीवनके संशयमें पड़ गया हूँ। ऐसी दशामें रणक्षेत्रमें मैं कैसे युद्ध करूँगा?' ॥ ६ ॥ (एवमुक्तस्तु राधेयो दुर्योधनमरिंदमम् ।) तमब्रवीन्महाराजं सूतपुत्रो नराधिपम् । यह सुनकर सूतपुत्र कर्णने शत्रुदमन नरनाथ महाराज दुर्योधनसे इस प्रकार कहा ॥ ६ १/३ ॥

कर्ण उवाच मा शोच भरतश्रेष्ठ करिष्येऽहं प्रियं तव ॥ ७ ॥ भीष्मः शान्तनवस्तूर्णमपयातु महारणात् । कर्ण बोला—भरतश्रेष्ठ! शोक न करो। मैं तुम्हारा प्रिय कार्य करूँगा, परंतु शान्तनुनन्दन भीष्म शीघ्र ही महायुद्धसे हट जायँ ॥ ७ १/२ ॥ निवृत्ते युधि गाङ्गेये न्यस्तशस्त्रे च भारत ॥ ८ ॥ अहं पार्थान् हनिष्यामि सहितान् सर्वसोमकैः । पश्यतो युधि भीष्मस्य शपे सत्येन ते नृप ॥ ९ ॥ भरतवंशी नरेश! जब युद्धमें गंगानन्दन भीष्म हथियार डाल देंगे और उससे सर्वथा निवृत्त हो जायँगे, उस समय मैं युद्धमें भीष्मके देखते-देखते सोमकोंसहित समस्त कुन्तीपुत्रोंको एक साथ मार डालूँगा, यह मैं तुमसे सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ ॥ ८-९ ॥

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