महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदिशः प्रज्वलिता राजन् पांसुवर्षं पपात च ॥ २४ ॥
रुधिरेण समुन्मिश्रमस्थिवर्षं तथैव च।
रुदतां वाहनानां च नेत्रेभ्यः प्रापतज्जलम् ॥ २५ ॥
महाराज! वे गीदड़ियाँ सिरपर आये हुए विकट विनाशकी सूचना दे रही थीं। राजन्! दिशाएँ जलती प्रतीत होने लगीं। सब ओर धूलकी वर्षा होने लगी। रक्तमिश्रित हड्डियाँ बरसने लगीं। रोते हुए वाहनोंके नेत्रोंसे आँसू गिरने लगे ॥ २४-२५ ॥
सुस्रुवुश्च शकृन्मूत्रं प्रध्यायन्तो विशाम्पते।
अन्तर्हिता महानादाः श्रूयन्ते भरतर्षभ ॥ २६ ॥
रक्षसां पुरुषादानां नदतां भैरवान् रवान्।
प्रजानाथ! वे सारे वाहन भारी चिन्तामें पड़कर मल-मूत्र करने लगे। भरतश्रेष्ठ! भयंकर गर्जना करनेवाले नरभक्षी राक्षसोंके महान् शब्द सुनायी पड़ते थे; परंतु उनके बोलनेवाले अदृश्य थे ॥ २६ १/२ ॥
सम्पतन्तश्च दृश्यन्ते गोमायुबलवायसाः ॥ २७ ॥
श्वानश्च विविधैर्नादैर्वाशन्तस्तत्र मारिष।
चारों ओरसे गीदड़ और बलशाली कौए वहाँ टूटे पड़ते थे। आर्य! वहाँ कुत्ते भी नाना प्रकारकी आवाजमें भूँकते देखे जाते थे ॥ २७ १/२ ॥
ज्वलिताश्च महोल्का वै समाहत्य दिवाकरम्।
निपेतुः सहसा भूमौ वेदयन्त्यो महत् भयम् ॥ २८ ॥
बड़ी-बड़ी प्रज्वलित उल्काएँ सूर्यदेवसे टकरा-कर महान् भयकी सूचना देती हुई सहसा पृथ्वीपर गिर रही थीं ॥ २८ ॥
महान्त्यनीकानि महासमुच्छ्रये
ततस्तयोः पाण्डवधार्तराष्ट्रयोः।
चकम्पिरे शङ्खमृदङ्गनिःस्वनैः
प्रकम्पितानीव वनानि वायुना ॥ २९ ॥
नरेन्द्रनागाश्वसमाकुलाना-
मभ्यायतीनामशिवे मुहूर्ते।
बभूव घोषस्तमुलश्चमूनां
वातोद्धुतानामिव सागराणाम् ॥ ३० ॥
उस महान् संग्राममें पाण्डव तथा कौरवपक्षकी विशाल सेनाएँ शंख और मृदंगकी ध्वनियोंसे उसी प्रकार काँप रही थीं, जैसे वायुके वेगसे समूचा वन-प्रान्त हिलने लगता है। उस अमंगलजनक मुहूर्तमें नरेशों, हाथियों और अश्वोंसे परिपूर्ण हो परस्पर आक्रमण करती हुई उभय पक्षकी उन विशाल सेनाओंका भयंकर शब्द वायुसे विक्षुब्ध हुए समुद्रोंकी गर्जनाके समान जान पड़ता था ॥ २९-३० ॥