भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 2148, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 2148

प्राचलत् सर्वतो राजन् वातोद्धूत इवार्णवः ॥ २८ ॥ राजन्! उसके महान् गर्जनसे वायुसे विक्षुब्ध हुए समुद्रके समान पाण्डवोंकी विशाल सेनामें सब ओर हलचल मच गयी ॥ २८ ॥
बहवश्च महाराज तस्य नादेन भीषिताः ।
प्रियान् प्राणान् परित्यज्य निपेतुर्धरणीतले ॥ २९ ॥
महाराज! उसके सिंहनादसे भयभीत हो बहुत-से सैनिक अपने प्यारे प्राणोंको त्यागकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २९ ॥
कार्ष्णिश्चापि मुदा युक्तः प्रगृह्य सशरं धनुः ।
नृत्यन्निव रथोपस्थे तद् रक्षः समुपाद्रवत् ॥ ३० ॥
अभिमन्यु भी हर्ष और उत्साहमें भरकर हाथमें धनुष-बाण लिये रथकी बैठकमें नृत्य-सा करता हुआ उस राक्षसकी ओर दौड़ा ॥ ३० ॥
ततः स राक्षसः क्रुद्धः सम्प्राप्यैवार्जुनिं रणे ।
नातिदूरे स्थितां तस्य द्रावयामास वै चमूम् ॥ ३१ ॥
तत्पश्चात् क्रोधमें भरा हुआ वह राक्षस युद्धमें अभिमन्युके समीप पहुँचकर पास ही खड़ी हुई उसकी सेनाको भगाने लगा ॥ ३१ ॥
तां वध्यमानां च तथा पाण्डवानां महाचमूम् ।
प्रत्युद्ययौ रणे रक्षो देवसेनां यथा बलः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार पीड़ित हुई पाण्डवोंकी विशाल वाहिनीपर उस राक्षसने युद्धमें उसी प्रकार धावा किया, जैसे बल नामक दैत्यने देवसेनापर आक्रमण किया था ॥ ३२ ॥
विमर्दः सुमहानासीत् तस्य सैन्यस्य मारिष ।
रक्षसा घोररूपेण वध्यमानस्य संयुगे ॥ ३३ ॥
आर्य! युद्धस्थलमें भयंकर राक्षसके द्वारा मारी जाती हुई उस सेनाका महान् संहार होने लगा ॥ ३३ ॥
ततः शरसहस्रैस्तां पाण्डवानां महाचमूम् ।
व्यद्रावयद् रणे रक्षो दर्शयन् स्वपराक्रमम् ॥ ३४ ॥
उस समय राक्षसने अपना पराक्रम दिखाते हुए रणक्षेत्रमें सहस्रों बाणोंद्वारा पाण्डवोंकी उस विशाल सेनाको खदेड़ना आरम्भ किया ॥ ३४ ॥
सा वध्यमाना च तथा पाण्डवानामनीकिनी ।
रक्षसा घोररूपेण प्रदुद्राव रणे भयात् ॥ ३५ ॥
उस घोर राक्षसके द्वारा उस प्रकार मारी जाती हुई वह पाण्डवसेना भयके मारे रणभूमिसे भाग चली ॥ ३५ ॥
प्रमृद्य च रणे सेनां
पद्मिनीं वारणो यथा ।

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