भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 2150, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 2150

सोऽतिविद्धो महाराज मुहूर्तंमथ मारिष । प्रविवेश तमो दीर्घं पीडितस्तैर्महारथैः ॥ ४४ ॥ महाराज! उन महारथियोंके बाणोंसे अत्यन्त आहत और पीड़ित हो अलम्बुष दो घड़ीतक भारी मोह (मूर्च्छा)-में डूबा रहा ॥ ४४ ॥

प्रतिलभ्य ततः संज्ञां क्रोधेन द्विगुणीकृतः । चिच्छेद सायकांस्तेषां ध्वजांश्चैव धनूंषि च ॥ ४५ ॥ तदनन्तर होशमें आकर वह दूने क्रोधसे जल उठा। फिर उसने उनके सायकों, ध्वजों और धनुषोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ ४५ ॥

एकैकं पञ्चभिर्बाणैराजघान स्मयन्निव । अलम्बुषो रथोपस्थे नृत्यन्निव महारथः ॥ ४६ ॥ इसके बाद रथकी बैठकमैं नृत्य-सा करते हुए महारथी अलम्बुषने मुसकराते हुए उनमेंसे एक-एकको पाँच-पाँच बाणोंद्वारा घायल कर दिया ॥ ४६ ॥

त्वरमाणः सुसंरब्धो हयांस्तेषां महात्मनाम् । जघान राक्षसः क्रुद्धः सारथींश्च महाबलः ॥ ४७ ॥ फिर अत्यन्त उतावलीके साथ रोषावेशमें भरे हुए उस महाबली राक्षसने कुपित हो उन महामनस्वी पाँचों भाइयोंके घोड़ों और सारथियोंको भी मार डाला ॥ ४७ ॥

बिभेद च सुसंरब्धः पुनश्चैनान् सुसंशितैः । शरैर्बहुविधाकारैः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४८ ॥ इसके बाद पुनः कुपित हो भाँति-भाँतिके सैकड़ों और हजारों तीखे बाणोंद्वारा उन सबको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ४८ ॥

विरथांश्च महेष्वासान् कृत्वा तत्र स राक्षसः । अभिदुद्राव वेगेन हन्तुकामो निशाचरः ॥ ४९ ॥ उन महाधनुर्धर वीरोंको रथहीन करके युद्धमें उन्हें मार डालनेकी इच्छासे निशाचर अलम्बुषने बड़े वेगसे उनपर धावा किया ॥ ४९ ॥

तानर्दितान् रणे तेन राक्षसेन दुरात्मना । दृष्ट्वार्जुनसुतः संख्ये राक्षसं समुपाद्रवत् ॥ ५० ॥ उन पाँचों भाइयोंको रणक्षेत्रमें दुरात्मा राक्षसके द्वारा अत्यन्त पीड़ित देख अर्जुनकुमार अभिमन्युने पुनः उसके ऊपर आक्रमण किया ॥ ५० ॥

तयोः समभवद् युद्धं वृत्रवासवयोरिव । ददृशुस्तावकाः सर्वे पाण्डवाश्च महारथाः ॥ ५१ ॥ फिर उन दोनोंमें वृत्रासुर और इन्द्रके समान भयंकर युद्ध होने लगा। आपके और पाण्डवपक्षके सभी महारथी उस युद्धको देखने लगे ॥ ५१ ॥

तौ समेतौ महायुद्धे क्रोधदीप्तौ परस्परम् ।