भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2153

भीमसेन, नकुल और सहदेवने युद्धमें किस प्रकार पराक्रम किया और उसी प्रकार भीष्म, द्रोण आदि आपके सभी योद्धाओंने निर्भीक-से होकर अद्भुत और विचित्र कर्म किये—यह सब भी मुझसे सुनिये ॥ ५–७ ॥

अलम्बुषस्तु समरे अभिमन्युं महारथम् । विनद्य सुमहानादं तर्जयित्वा मुहुर्मुहुः ॥ ८ ॥ अभिदुद्राव वेगेन तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् । अलम्बुषने समरभूमिमें महारथी अभिमन्युको जोर-जोरसे गर्जना करके बारंबार डाँट बतायी और 'खड़ा रह, खड़ा रह' ऐसा कहकर बड़े वेगसे उसपर धावा किया ॥ ८ १/२ ॥

अभिमन्युश्च वेगेन सिंहवद् विनदन् मुहुः ॥ ९ ॥ आर्श्यशृङ्गिं महेष्वासं पितुरत्यन्तवैरिणम् । इसी प्रकार वीर अभिमन्युने भी बारंबार सिंहनाद करते हुए अपने पितृव्य भीमसेनके अत्यन्त वैरी महाधनुर्धर अलम्बुषपर वेगसे आक्रमण किया ॥ ९ १/२ ॥

ततः समीयातुः संख्ये त्वरितौ नरराक्षसौ ॥ १० ॥ रथाभ्यां रथिनौ श्रेष्ठौ यथा वै देवदानवौ । फिर तो वे मनुष्य तथा राक्षस दोनों वीर तुरंत ही युद्धस्थलमें एक-दूसरेसे भिड़ गये। दोनों ही रथियोंमें श्रेष्ठ थे, अतः देवता और दानवकी भाँति रथोंद्वारा एक-दूसरेका सामना करने लगे ॥ १० १/२ ॥

मायावी राक्षसश्रेष्ठो दिव्यास्त्रश्चैव फाल्गुनिः ॥ ११ ॥ राक्षसश्रेष्ठ अलम्बुष मायावी था और अर्जुनकुमार अभिमन्युको दिव्यास्त्रोंका ज्ञान था ॥ ११ ॥

ततः कार्ष्णिर्महाराज निशितैः सायकैस्त्रिभिः । आर्श्यशृङ्गिं रणे विद्ध्वा पुनर्विव्याध पञ्चभिः ॥ १२ ॥ महाराज! तदनन्तर अर्जुनपुत्र अभिमन्युने तीन तीखे सायकोंसे रणक्षेत्रमें अलम्बुषको बींधकर पुनः पाँच बाणोंसे घायल कर दिया ॥ १२ ॥

अलम्बुषोऽपि संक्रुद्धः कार्ष्णिं नवभिराशुगैः । हृदि विव्याध वेगेन तोत्रैरिव महाद्विपम् ॥ १३ ॥ तब क्रोधमें भरे हुए अलम्बुषने भी नौ शीघ्रगामी बाणोंद्वारा अर्जुनपुत्र अभिमन्युकी छातीमें उसी प्रकार वेगपूर्वक प्रहार किया, जैसे अंकुशद्वारा गजराजपर प्रहार किया जाता है ॥ १३ ॥

ततः शरसहस्रेण क्षिप्रकारी निशाचरः । अर्जुनस्य सुतं संख्ये पीडयामास भारत ॥ १४ ॥ भारत! तत्पश्चात् शीघ्रतापूर्वक सारे कार्य करनेवाले निशाचरने एक हजार बाण मारकर युद्धस्थलमें अर्जुनके पुत्रको पीड़ित कर दिया ॥ १४ ॥