महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजैसे राहु चन्द्रमाको ग्रस लेता है, उसी प्रकार सात्यकिके द्वारा अपने पुत्रपर ग्रहण लगा हुआ देख प्रतापी द्रोणाचार्यने उनके ऊपर धावा किया ॥ ५५ ॥ विव्याध च सुतीक्ष्णेन पृषत्केन महामृधे । परीप्सन् स्वसुतं राजन् वार्ष्णेयेनाभिपीडितम् ॥ ५६ ॥ राजन्! उस महायुद्धमें सात्यकिद्वारा पीड़ित हुए अपने पुत्रकी रक्षा करनेके लिये आचार्यने तीखे बाणसे उन्हें घायल कर दिया ॥ ५६ ॥ सात्यकिस्तु रणे हित्वा गुरुपुत्रं महारथम् । द्रोणं विव्याध विंशत्या सर्वपारशवैः शरैः ॥ ५७ ॥ तब सात्यकिने रणक्षेत्रमें गुरुपुत्र महारथी अश्वत्थामाको छोड़कर पूर्णतः लोहेके बने हुए बीस बाणोंसे द्रोणाचार्यको बींध डाला ॥ ५७ ॥ तदन्तरममेयात्मा कौन्तेयः शत्रुतापनः । अभ्यद्रवद् रणे क्रुद्धो द्रोणं प्रति महारथः ॥ ५८ ॥ इसी समय शत्रुओंको संताप देनेवाले अमेय आत्मबलसे सम्पन्न महारथी कुन्तीपुत्र अर्जुन युद्धस्थलमें कुपित हो द्रोणाचार्यपर टूट पड़े ॥ ५८ ॥ ततो द्रोणश्च पार्थश्च समेयातां महामृधे । यथा बुधश्च शुक्रश्च महाराज नभस्तले ॥ ५९ ॥ महाराज! तत्पश्चात् द्रोणाचार्य और अर्जुन उस महासमरमें एक-दूसरेसे भिड़ गये, मानो आकाशमें बुध और शुक्र एक-दूसरेपर आक्रमण कर रहे हों ॥ ५९ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि अलम्बुषाभिमन्युयुद्धे एकाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें अलम्बुष और अभिमन्युका युद्धविषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०१ ॥