भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 2161

शरवृष्ट्या पुनः पार्थश्छादयामास तं रणे । स प्रजज्वाल रोषेण गहनेऽग्निरिवोर्जितः ॥ ७ ॥ तब अर्जुनने समरभूमिमें अपने बाणोंकी वर्षासे पुनः द्रोणाचार्यको ढक दिया। यह देख वे रोषसे जल उठे, मानो वनमें दावानल प्रज्वलित हो उठा हो ॥ ७ ॥ ततोऽर्जुनं रणे द्रोणः शरैः संनतपर्वभिः । छादयामास राजेन्द्र नचिरादेव भारत ॥ ८ ॥ भरतनन्दन! राजेन्द्र! तब द्रोणाचार्यने युद्धमें झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे अर्जुनको शीघ्र ही आच्छादित कर दिया ॥ ८ ॥ ततो दुर्योधनो राजा सुशर्माणमचोदयत् । द्रोणस्य समरे राजन् पार्ष्णिग्रहणकारणात् ॥ ९ ॥ राजन्! तब राजा दुर्योधनने सुशर्माको समरभूमिमें द्रोणाचार्यके पृष्ठभागकी रक्षाके लिये प्रेरित किया ॥ ९ ॥ त्रिगर्तराडपि क्रुद्धो भृशमायम्य कार्मुकम् । छादयामास समरे पार्थं बाणैरयोमुखैः ॥ १० ॥ उसकी आज्ञा पाकर त्रिगर्तराज सुशर्माने भी समरमें क्रोधपूर्वक धनुषको अत्यन्त खींचकर लोहमुख बाणोंके द्वारा अर्जुनको ढक दिया ॥ १० ॥ ताभ्यां मुक्ताः शरा राजन्नन्तरिक्षे विरेजिरे । हंसा इव महाराज शरत्काले नभस्तले ॥ ११ ॥ महाराज! जैसे शरद्-ऋतुके आकाशमें हंस उड़ते दिखायी देते हैं, उसी प्रकार उन दोनोंके छोड़े हुए बाण आकाशमें सुशोभित हो रहे थे ॥ ११ ॥ ते शराः प्राप्य कौन्तेयं समन्ताद् विविशुः प्रभो । फलभारनतं यद्वत् स्वादुवृक्षं विहङ्गमाः ॥ १२ ॥ प्रभो! वे बाण सब ओरसे कुन्तीकुमार अर्जुनके ऊपर पड़कर उनके शरीरमें धँसने लगे, मानो फलोंके भारसे झुके स्वादिष्ट वृक्षपर चारों ओरसे पक्षी टूटे पड़ते हों ॥ १२ ॥ अर्जुनस्तु रणे नादं विनद्य रथिनां वरः । त्रिगर्तराजं समरे सपुत्रं विव्यधे शरैः ॥ १३ ॥ तब रथियोंमें श्रेष्ठ अर्जुनने सिंहनाद करके समरांगणमें पुत्रसहित त्रिगर्तराज सुशर्माको अपने बाणोंसे घायल कर दिया ॥ १३ ॥ ते वध्यमानाः पार्थेन कालेनेव युगक्षये । पार्थमेवाभ्यवर्तन्त मरणे कृतनिश्चयाः ॥ १४ ॥ जैसे प्रलयकालमें साक्षात् काल सबको मार डालता है, उसी प्रकार अर्जुनकी मार खाकर त्रिगर्तदेशीय सैनिक मरनेका निश्चय करके पुनः उन्हींपर टूट पड़े ॥ मुमुचुः शरवृष्टिं च पाण्डवस्य रथं प्रति ।