महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2168, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्रासीत् सुमहद् युद्धं तव तेषां च संकुलम् ।
नराश्वरथनागानां यमराष्ट्रविवर्धनम् ॥ १६ ॥
तब वहाँ उन सबके पैदल, घुड़सवार, रथी और हाथीसवारोंमें अत्यन्त भयंकर
घमासान युद्ध होने लगा, जो यमराजके राष्ट्रकी वृद्धि करनेवाला था ।। १६ ।।
रथी रथिनमासाद्य प्राहिणोद् यमसादनम् ।
तथेतरान् समासाद्य नरनागाश्वसादिनः ॥ १७ ॥
रथीने रथीका सामना करके उसे यमलोक पहुँचा दिया। पैदल, हाथीसवार और
घुड़सवारोंने भी एक-दूसरेसे भिड़कर ऐसा ही किया ।। १७ ।।
अनयन् परलोकाय शरैः संनतपर्वभिः ।
शरैश्च विविधैर्घोरैस्तत्र तत्र विशाम्पते ॥ १८ ॥
प्रजानाथ! उस युद्धस्थलमें जहाँ-तहाँ सब योद्धा झुकी हुई गाँठवाले नाना प्रकारके
भयंकर बाणोंद्वारा अपने विपक्षियोंको परलोकके अतिथि बनाने लगे ।।
रथास्तु रथिभिर्हीना हतसारथयस्तथा ।
विप्रद्रुताश्वाः समरे दिशो जग्मुः समन्ततः ॥ १९ ॥
कितने ही रथ रथियों और सारथियोंसे शून्य हो भागते हुए घोड़ोंके साथ सम्पूर्ण
दिशाओंमें चक्कर काट रहे थे ।। १९ ।।
मृद्नन्तस्ते नरान् राजन् हयांश्च सुबहून् रणे ।
वातायमाना दृश्यन्ते गन्धर्वनगरोपमाः ॥ २० ॥
राजन्! वे रथ उस रणक्षेत्रमें आपके बहुत-से पैदल मनुष्यों तथा घोड़ोंको कुचलते हुए
हवाके समान तीव्र गतिसे भाग रहे थे और गन्धर्वनगरके समान दृष्टिगोचर हो रहे
थे ।। २० ।।
रथिनश्च रथैर्हीना वर्मिणस्तेजसा युताः ।
कुण्डलोष्णीषिणः सर्वे निष्काङ्गदविभूषणाः ॥ २१ ॥
देवपुत्रसमाः सर्वे शौर्ये शक्रसमा युधि ।
ऋद्ध्या वैश्रवणं चाति नयेन च बृहस्पतिम् ॥ २२ ॥
सर्वलोकेश्वराः शूरास्तत्र तत्र विशाम्पते ।
विप्रद्रुता व्यदृश्यन्त प्राकृता इव मानवाः ॥ २३ ॥
प्रजानाथ! कितने ही रथी रथोंसे हीन हो गये थे। वे कवच, कुण्डल और पगड़ी धारण
किये बड़े तेजस्वी दिखायी देते थे। उन सबने कण्ठमें स्वर्णमय पदक और भुजाओंमें
बाजूबंद धारण कर रखे थे। वे देखनेमें देवकुमारोंके समान सुन्दर और युद्धमें इन्द्रके समान
शौर्यसम्पन्न थे। वे समृद्धिमें कुबेर और नीतिज्ञतामें बृहस्पतिजीसे भी बढ़कर थे। ऐसे
सर्वलोकेश्वर शूरवीर भी रथहीन हो गँवार मनुष्योंकी भाँति जहाँ-तहाँ भागते दिखायी देते
थे ।। २१—२३ ।।