महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2196, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रातारं नाध्यगच्छन्त गावः पङ्कगता इव ।
पिपीलिका इव क्षुण्णा दुर्बला बलिना रणे ।। ८३ ।।
भारत! भागती हुई पाण्डव-सेनाएँ कीचड़में फँसी हुई गायोंकी भाँति किसीको अपना रक्षक नहीं पाती थीं। समरभूमिमें बलवान् भीष्मने उन दुर्बल सैनिकोंको चींटियोंकी भाँति मसल डाला ।। ८२-८३ ।।
महारथं भारत दुष्प्रकम्पं
शरौघिणं प्रतपन्तं नरेन्द्रान् ।
भीष्मं न शेकुः प्रतिवीक्षितुं ते
शरार्चिषं सूर्यमिवातपन्तम् ।। ८४ ।।
भारत! महारथी भीष्म अविचलभावसे खड़े होकर बाणोंकी वर्षा करते और पाण्डव-पक्षीय नरेशोंको संताप देते थे। बाणरूपी किरणावलियोंसे सुशोभित और सूर्यकी भाँति तपते हुए भीष्मकी ओर वे देख भी नहीं पाते थे ।। ८४ ।।
विमृद्नतस्तस्य तु पाण्डुसेना-
मस्तं जगामाथ सहस्ररश्मिः ।
ततो बलानां श्रमकर्शितानां
मनोऽवहारं प्रति सम्बभूव ।। ८५ ।।
भीष्म पाण्डव-सेनाको जब इस प्रकार रौंद रहे थे, उसी समय सहस्रों किरणोंसे सुशोभित भगवान् सूर्य अस्ताचलको चले गये। उस समय परिश्रमसे थकी हुई समस्त सेनाओंके मनमें यही इच्छा हो रही थी कि अब युद्ध बंद हो जाय ।। ८५ ।।
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि नवमदिवसयुद्धसमाप्तौ
षडधिकशततमोऽध्यायः ।। १०६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें नवें दिनके युद्धका
समाप्तिविषयक एक सौ छठा अध्याय पूरा हुआ ।। १०६ ।।
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ८९ १/२ श्लोक हैं।]