महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 220, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंवृद्धाः स्त्रियो याश्च गुणोपपन्ना ज्ञायन्ते नः संजय मातरस्ताः । ताभिः सर्वाभिः सहिताभिः समेत्य स्त्रीभिर्वृद्धाभिरभिवादं वदेथाः ॥ ३२ ॥ संजय! राजघरानेमें जो सद्गुणवती वृद्धा स्त्रियाँ हैं, वे सब हमारी माताएँ लगती हैं। उन सब वृद्धा स्त्रियोंसे एक साथ मिलकर तुम उनसे हमारा प्रणाम निवेदन करना ॥ ३२ ॥ कच्चित् पुत्रा जीवपुत्राः सुसम्यग् वर्तन्ते वो वृत्तिमन्नृशंसरूपाः । इति स्मोक्त्वा संजय ब्रूहि पश्चा- दजातशत्रुः कुशली सपुत्रः ॥ ३३ ॥ संजय! उन बड़ी-बूढ़ी स्त्रियोंसे इस प्रकार कहना—‘माताओं! आपके पुत्र आपके साथ उत्तम बर्ताव करते हैं न? उनमें क्रूरता तो नहीं आ गयी है? उन सबके दीर्घायु पुत्र हो गये हैं न?’ इस प्रकार कहकर पीछे यह बताना कि आपका बालक अजातशत्रु युधिष्ठिर पुत्रोंसहित सकुशल है ॥ ३३ ॥ या नो भार्याः संजय वेत्थ तत्र तासां सर्वासां कुशलं तात पृच्छेः । सुसंगुप्ताः सुरभयोऽनवद्याः कच्चिद् गृहानावसथाप्रमत्ताः ॥ ३४ ॥ कच्चिद् वृत्तिं श्वशुरेषु भद्राः कल्याणीं वर्तध्वमनृशंसरूपाम् । यथा च वः स्युः पतयोऽनुकूला- स्तथा वृत्तिमात्मनः स्थापयध्वम् ॥ ३५ ॥ तात संजय! हस्तिनापुरमें हमारे भाइयोंकी जो स्त्रियाँ हैं, उन सबको तो तुम जानते ही हो। उन सबकी कुशल पूछना और कहना क्या तुमलोग सर्वथा सुरक्षित रहकर निर्दोष जीवन बिता रही हो? तुम्हें आवश्यक सुगन्ध आदि प्रसाधन-सामग्रियाँ प्राप्त होती हैं न? तुम घरमें प्रमादशून्य होकर रहती हो न? भद्र महिलाओ! क्या तुम अपने श्वशुरजनोंके प्रति क्रूरतारहित कल्याणकारी बर्ताव करती हो तथा जिस प्रकार तुम्हारे पति अनुकूल बने रहें, वैसे व्यवहार और सद्भावको अपने हृदयमें स्थान देती हो? ॥ ३४-३५ ॥ या नः स्नुषाः संजय वेत्थ तत्र प्राप्ताः कुलेभ्यश्च गुणोपपन्नाः । प्रजावत्यो ब्रूहि समेत्य ताश्च युधिष्ठिरो वोऽभ्यवदत् प्रसन्नः ॥ ३६ ॥