भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 2200, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 2200

‘श्रीकृष्ण! ऐसी स्थितिमें मैं अपनी बुद्धिकी दुर्बलताके कारण युद्धस्थलमें भीष्मको सामने देखकर शोकके समुद्रमें डूबा जा रहा हूँ॥ १८॥ वनं यास्यामि दुर्धर्ष श्रेयो वै तत्र मे गतम् । न युद्धं रोचते कृष्ण हन्ति भीष्मो हि नः सदा ॥ १९ ॥ ‘दुर्धर्ष वीर श्रीकृष्ण! अब मैं वनको चला जाऊँगा। मेरे लिये वनमें जाना ही कल्याणकारी होगा। मुझे युद्ध अच्छा नहीं लग रहा है; क्योंकि उसमें भीष्म सदा ही हमारे सैनिकोंका विनाश करते आ रहे हैं॥ १९॥ यथा प्रज्वलितं वह्निं पतङ्गः समभिद्रवन् । एकतो मृत्युमभ्येति तथाहं भीष्ममीयिवान् ॥ २० ॥ ‘जैसे पतंग प्रज्वलित आगकी ओर दौड़ा जाकर एकमात्र मृत्युको ही प्राप्त होता है, उसी प्रकार हमने भी भीष्मपर आक्रमण करके मृत्युका ही वरण किया है॥ २०॥ क्षयं नीतोऽस्मि वार्ष्णेय राज्यहेतोः पराक्रमी । भ्रातरश्चैव मे शूराः सायकैर्भृशपीडिताः ॥ २१ ॥ ‘वार्ष्णेय! राज्यके लिये पराक्रम करके मैं क्षीण होता जा रहा हूँ। मेरे शूरवीर भाई बाणोंकी मारसे अत्यन्त पीड़ित हो रहे हैं॥ २१॥ मत्कृते भ्रातृसौहार्दाद् राज्यभ्रष्टा वनं गताः । परिक्लिष्टा तथा कृष्णा मत्कृते मधुसूदन ॥ २२ ॥ ‘मधुसूदन! मेरे लिये भ्रातृस्नेहवश ये भाई राज्यसे वंचित हुए और वनमें भी गये। मेरे ही कारण कृष्णाको भरी सभामें अपमानका कष्ट भोगना पड़ा॥ २२॥ जीवितं बहु मन्येऽहं जीवितं ह्यद्य दुर्लभम् । जीवितस्याद्य शेषेण चरिष्ये धर्ममुत्तमम् ॥ २३ ॥ ‘इस समय मैं जीवनको ही बहुत मानता हूँ। आज तो जीवन भी दुर्लभ हो रहा है। अबसे जीवनके जितने दिन शेष हैं, उनके द्वारा मैं उत्तम धर्मका ही आचरण करूँगा॥ २३॥ यदि तेऽहमनुग्राह्यो भ्रातृभिः सह केशव । स्वधर्मस्याविरोधेन हितं व्याहर केशव ॥ २४ ॥ ‘केशव! यदि भाइयोंसहित मुझपर आपका अनुग्रह है तो मुझे स्वधर्मके अनुकूल कोई हितकारक सलाह दीजिये’ ॥ २४ ॥ एवं श्रुत्वा वचस्तस्य कारुण्याद् बहुविस्तरम् । प्रत्युवाच ततः कृष्णः सान्त्वयानो युधिष्ठिरम् ॥ २५ ॥ करुणासे प्रेरित होकर कहे हुए युधिष्ठिरके ये विस्तृत वचन सुनकर श्रीकृष्णने युधिष्ठिरको सान्त्वना देते हुए कहा॥ २५॥ धर्मपुत्र विषादं त्वं मा कृथाः सत्यसङ्गर ।