महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2202, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंएष चापि नरव्याघ्रो मत्कृते जीवितं त्यजेत् । एष नः समयस्तात तारयेम परस्परम् ॥ ३४ ॥ 'ये पुरुषसिंह अर्जुन भी मेरे लिये अपने प्राणोंतकका परित्याग कर सकते हैं। तात! हमलोगोंमें यह प्रतिज्ञा हो चुकी है कि हम एक-दूसरेको संकटसे उबारेंगे ॥ ३४ ॥ स मां नियुङ्क्ष्व राजेन्द्र यथा योद्धा भवाम्यहम् । प्रतिज्ञातमुपप्लव्ये यत् तत् पार्थेन पूर्वतः ॥ ३५ ॥ घातयिष्यामि गाङ्गेयमिति लोकस्य संनिधौ । परिरक्ष्यमिदं तावद् वचः पार्थस्य धीमतः ॥ ३६ ॥ 'राजेन्द्र! आप मुझे युद्धके काममें नियुक्त कीजिये। मैं आपका योद्धा बनूँगा। युद्धके पहले उपप्लव्यनगरमें सब लोगोंके सामने अर्जुनने जो यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं गंगानन्दन भीष्मका वध करूँगा, बुद्धिमान् पार्थके उस वचनका पालन करना मेरे लिये आवश्यक है ॥ ३५-३६ ॥ अनुज्ञातं तु पार्थेन मया कार्यं न संशयः । अथवा फाल्गुनस्यैष भारः परिमितो रणे ॥ ३७ ॥ 'अर्जुनने जिस बातके लिये प्रतिज्ञा की हो, उसकी पूर्ति करना मेरा कर्तव्य है, इसमें संशय नहीं है अथवा रणक्षेत्रमें अर्जुनके लिये यह बहुत थोड़ा भार है ॥ ३७ ॥ स हनिष्यति संग्रामे भीष्मं परपुरञ्जयम् । अशक्यमपि कुर्याद्धि रणे पार्थः समुद्यतः ॥ ३८ ॥ 'वे शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले भीष्मको युद्धमें अवश्य मार डालेंगे। कुन्तीपुत्र अर्जुन उद्यत हो जायँ तो युद्धमें असम्भवको भी सम्भव कर सकते हैं ॥ ३८ ॥ त्रिदशान् वा समुद्युक्तान् सहितान् दैत्यदानवैः । निहन्यादर्जुनः संख्ये किमु भीष्मं नराधिप ॥ ३९ ॥ 'नरेश्वर! दैत्यों और दानवोंसहित सम्पूर्ण देवताओंको भी अर्जुन युद्धमें मार सकते हैं; फिर भीष्मको मारना कौन बड़ी बात है ॥ ३९ ॥ विपरीतो महावीर्यो गतसत्त्वोऽल्पजीवनः । भीष्मः शान्तनवो नूनं कर्तव्यं नावबुध्यते ॥ ४० ॥ 'महापराक्रमी शान्तनुनन्दन भीष्म तो हमारे विपरीत पक्षका आश्रय लेनेवाले और बलहीन हैं। इनके जीवनके दिन अब बहुत थोड़े रह गये हैं, तथापि यह निश्चितरूपसे कहा जा सकता है कि वे अपने कर्तव्यको नहीं समझ रहे हैं' ॥ ४० ॥
युधिष्ठिर उवाच एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि माधव । सर्वे ह्येते न पर्याप्तास्तव वेगविधारणे ॥ ४१ ॥