भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 2204, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 2204

जनार्दन! पूछनेपर वे हमें सत्य और हितकर बात बतायेंगे। श्रीकृष्ण! वे जैसा कहेंगे, युद्धमें वैसा ही करूँगा।।

स नो जयस्य दाता स्यान्मन्त्रस्य च दृढव्रतः।
बालाः पित्रा विहीनाश्च तेन संवर्धिता वयम् ।। ५० ।।

दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले भीष्मजी हमारे लिये विजय और सलाहके भी दाता हो सकते हैं। बाल्यावस्थामें जब हम पितृहीन हो गये थे, उस समय उन्होंने ही हमारा पालन-पोषण किया था।। ५० ।।

तं चेत् पितामहं वृद्धं हन्तुमिच्छामि माधव ।
पितुः पितरमिष्टं च धिगस्तु क्षत्रजीविकाम् ।। ५१ ।।

माधव! यद्यपि वे हमारे पिताके भी पिता और प्रिय हैं, तो भी उन बूढ़े पितामह भीष्मको भी मैं मारना चाहता हूँ। क्षत्रियकी इस जीविकाको धिक्कार है! ।। ५१ ।।

संजय उवाच

ततोऽब्रवीन्महाराज वार्ष्णेयः कुरुनन्दनम् ।
रोचते मे महाप्राज्ञ राजेन्द्र तव भाषितम् ।। ५२ ।।

**संजय कहते हैं—**महाराज! तब भगवान् श्रीकृष्णने कुरुनन्दन युधिष्ठिरसे कहा—'महामते राजेन्द्र! आपका कथन मुझे ठीक जान पड़ता है ।। ५२ ।।

देवव्रतः कृती भीष्मः प्रेक्षितेनापि निर्दहेत् ।
गम्यतां स वधोपायं प्रष्टुं सागरगासुतः ।। ५३ ।।

'देवव्रत भीष्म पुण्यात्मा पुरुष हैं। वे दृष्टिपातमात्रसे सबको दग्ध कर सकते हैं; अतः गङ्गानन्दन भीष्मसे उनके वधका उपाय पूछनेके लिये आप अवश्य उनके पास चलें ।। ५३ ।।

वक्तुमर्हति सत्यं स त्वया पृष्टो विशेषतः ।
ते वयं तत्र गच्छामः प्रष्टुं कुरुपितामहम् ।। ५४ ।।
गत्वा शान्तनवं वृद्धं मन्त्रं पृच्छाम भारत ।
स वो दास्यति मन्त्रं यं तेन योत्स्यामहे परान् ।। ५५ ।।

'विशेषतः आपके पूछनेपर वे अवश्य सच्ची बात बतायेंगे। अतः हम सब लोग मिलकर कुरुकुलके वृद्ध पितामह शान्तनुनन्दन भीष्मसे अभीष्ट प्रश्न पूछनेके लिये साथ-साथ वहाँ चलें और भारत! चलकर उनसे हितकारक मन्त्रणा पूछें। वे आपको ऐसी मन्त्रणा देंगे, जिससे हमलोग शत्रुओंके साथ युद्ध करेंगे ।। ५४-५५ ।।

एवमामन्त्र्य ते वीराः पाण्डवाः पाण्डुपूर्वजम् ।
जग्मुस्ते सहिताः सर्वे वासुदेवश्च वीर्यवान् ।। ५६ ।।

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