महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2206, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंन हि ते सूक्ष्ममप्यस्ति रन्ध्रं कुरुपितामह ॥ ६४ ॥
‘वीर! समरभूमिमें हमलोग आपका वेग कैसे सह सकते हैं? कुरुकुलके वृद्ध पितामह! आपमें कोई छोटा-सा भी छिद्र (दोष) नहीं दृष्टिगोचर होता है ॥ ६४ ॥
मण्डलेनैव धनुषा दृश्यसे संयुगे सदा ।
आददानं संदधानं विकर्षन्तं धनूर्न च ॥ ६५ ॥
पश्यामस्त्वां महाबाहो रथे सूर्यमिवापरम् ।
‘आप युद्धमें सदा मण्डलाकार धनुषके साथ ही परिलक्षित होते हैं। महाबाहो! आप रथपर दूसरे सूर्यके समान विराजमान होकर कब बाण हाथमें लेते हैं, कब धनुषपर रखते हैं और कब उसकी डोरीको खींचते हैं, यह सब हमलोग नहीं देख पाते हैं ॥ ६५ १/२ ॥
रथाश्वनरनागानां हन्तारं परवीरहन् ॥ ६६ ॥
कोऽथ वोत्सहते जेतुं त्वां पुमान् भरतर्षभ ।
‘शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले भरतश्रेष्ठ! आप रथ, अश्व, पैदल मनुष्य और हाथियोंका भी संहार करनेवाले हैं। कौन पुरुष आपको जीतनेका साहस कर सकता है? ॥ ६६ १/२ ॥
वर्षता शरवर्षाणि संयुगे वैशसं कृतम् ॥ ६७ ॥
क्षयं नीता हि पृतना संयुगे महती मम ।
‘आपने युद्धस्थलमें बाणोंकी वर्षा करके भारी संहार मचा रखा है। रणक्षेत्रमें मेरी विशाल सेना आपके द्वारा नष्ट हो चुकी है ॥ ६७ १/२ ॥
यथा युधि जयेम त्वां यथा राज्यं भृशं मम ॥ ६८ ॥
मम सैन्यस्य च क्षेमं तन्मे ब्रूहि पितामह ।
‘पितामह! हमलोग युद्धमें जिस प्रकार आपको जीत सकें, जिस प्रकार हमें विपुल राज्यकी प्राप्ति हो सके और जिस प्रकार मेरी सेना भी सकुशल रह सके, वह उपाय मुझे बताइये’ ॥ ६८ १/२ ॥
ततोऽब्रवीच्छान्तनवः पाण्डवान् पाण्डुपूर्वजः ॥ ६९ ॥
न कथञ्चन कौन्तेय मयि जीवति संयुगे ।
जयो भवति सर्वज्ञ सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ७० ॥
तब पाण्डुके पितृतुल्य शान्तनुकुमार भीष्मजीने पाण्डवोंसे इस प्रकार कहा—‘कुन्तीकुमार! मेरे जीते-जी युद्धमें किसी प्रकार तुम्हारी विजय नहीं हो सकती। सर्वज्ञ! मैं तुमसे यह सच्ची बात कहता हूँ ॥ ६९-७० ॥
निर्जिते मयि युद्धेन रणे जेष्यथ पाण्डवाः ।
क्षिप्रं मयि प्रहरध्वं यदीच्छथ रणे जयम् ॥ ७१ ॥
‘पाण्डवो! यदि युद्धके द्वारा मैं किसी प्रकार जीत लिया जाऊँ, तभी तुमलोग रणक्षेत्रमें विजयी हो सकोगे। यदि युद्धमें विजय चाहते हो तो मुझपर शीघ्र ही (घातक) प्रहार करो ॥ ७१ ॥