महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउन महारथी वीरोंद्वारा सब ओरसे मारी और खदेड़ी जाती हुई आपकी सेना सब दिशाओंमें भाग खड़ी हुई ॥ २२ ॥
त्रातारं नाध्यगच्छन्त तावका भरतर्षभ ।
वध्यमानाः शितैर्बाणैः पाण्डवैः सहसृञ्जयैः ॥ २३ ॥
भरतश्रेष्ठ! पाण्डवों और सृञ्जयोंके तीखे बाणोंसे घायल होनेवाले आपके सैनिकोंको कोई रक्षक नहीं मिलता था ॥ २३ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
पीड्यमानं बलं दृष्ट्वा पार्थैर्भीष्मः पराक्रमी ।
यदकार्षीद् रणे क्रुद्धस्तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ २४ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! कुन्तीकुमारोंके द्वारा अपनी सेनाको पीड़ित हुई देख युद्धमें क्रुद्ध हुए पराक्रमी भीष्मने क्या किया? यह मुझे बताओ ॥ २४ ॥
कथं वा पाण्डवान् युद्धे प्रत्युद्यातः परंतपः ।
विनिघ्नन् सोमकान् वीरस्तदाचक्ष्व ममानघ ॥ २५ ॥
अनघ! शत्रुओंको संताप देनेवाले वीरवर भीष्मने युद्धस्थलमें सोमकोंका संहार करते हुए उस समय पाण्डवोंपर किस प्रकार आक्रमण किया? वह सब भी मुझे बताओ ॥ २५ ॥
संजय उवाच
आचक्षे ते महाराज यदकार्षीत् पिता तव ।
पीडिते तव पुत्रस्य सैन्ये पाण्डवसृञ्जयैः ॥ २६ ॥
संजयने कहा—महाराज! पाण्डवों तथा सृञ्जयों-द्वारा आपके पुत्रकी सेनाके पीड़ित होनेपर आपके ताऊ भीष्मने जो कुछ किया था, वह सब आपको बता रहा हूँ ॥ २६ ॥
प्रहृष्टमनसः शूराः पाण्डवाः पाण्डुपूर्वज ।
अभ्यवर्तन्त निघ्नन्तस्तव पुत्रस्य वाहिनीम् ॥ २७ ॥
पाण्डुके बड़े भैया! शूरवीर पाण्डव मनमें हर्ष और उत्साह भरकर आपके पुत्रकी सेनाका संहार करते हुए आगे बढ़े ॥ २७ ॥
तं विनाशं मनुष्येन्द्र नरवारणवाजिनाम् ।
नामृष्यत तदा भीष्मः सैन्यघातं रणे परैः ॥ २८ ॥
नरेन्द्र! उस समय मनुष्यों, हाथियों और घोड़ोंके उस विनाशको—रणक्षेत्रमें शत्रुओंद्वारा किये जानेवाले अपनी सेनाके संहारको भीष्मजी नहीं सह सके ॥ २८ ॥
स पाण्डवान् महेष्वासः पञ्चालांश्चैव सृञ्जयान् ।
नाराचैर्वत्सदन्तैश्च शितैरञ्जलिकैस्तथा ॥ २९ ॥
अभ्यवर्षत दुर्धर्षस्त्यक्त्वा जीवितमात्मनः ।