महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहस्त्याजीवा बहवो येऽत्र सन्ति । आख्याय मां कुशलिनं स्म तेभ्यो- ऽप्यनामयं परिपृच्छेर्जघन्यम् ॥ ४१ ॥ हस्तिनापुरमें जो बहुत-से हाथीवान हैं तथा जो अन्धे और बूढ़े हैं, उन सबको मेरी कुशल बताकर अन्तमें मेरी ओरसे उनके भी आरोग्य आदिका समाचार पूछना ॥
मा भैष्ट दुःखेन कुजीवितेन नूनं कृतं परलोकेषु पापम् । निगृह्य शत्रून् सुहृदोऽनुगृह्य वासोभिरन्नेन च वो भरिष्ये ॥ ४२ ॥ साथ ही उन्हें आश्वासन देते हुए मेरा यह संदेश सुना देना। तुम्हें जो दुःख प्राप्त होता है अथवा कुत्सित जीवन बिताना पड़ता है, इसके कारण तुमलोग भयभीत न होना। निश्चय ही यह दूसरे जन्मोंमें किये हुए पापका फल प्रकट हुआ है। मैं कुछ ही दिनोंमें अपने शत्रुओंको कैद करके हितैषी सुहृदोंपर अनुग्रह करते हुए अन्न और वस्त्रद्वारा तुमलोगोंका भरण-पोषण करूँगा ॥ ४२ ॥
सन्त्येव मे ब्राह्मणेभ्यः कृतानि भावीन्यथो नो बत वर्तयन्ति । तान् पश्यामि युक्तरूपांस्तथैव तामेव सिद्धिं श्रावयेथा नृपं तम् ॥ ४३ ॥ राजा दुर्योधनसे कहना, मैंने कुछ ब्राह्मणोंके लिये वार्षिक जीविका-वृत्तियाँ नियत कर रखी थीं, किंतु खेद है कि तुम्हारे कर्मचारीगण उन्हें ठीकसे नहीं चला रहे हैं। मैं उन ब्राह्मणोंको पुनः पूर्ववत् उन्हीं वृत्तियोंसे युत देखना चाहता हूँ। तुम किसी दूतके द्वारा मुझे यह समाचार सुना दो कि उन वृत्तियोंका अब यथावत्रूपसे पालन होने लगा है ॥ ४३ ॥
ये चानाथा दुर्बलाः सर्वकाल- मात्मन्येव प्रयतन्तेऽथ मूढाः । तांश्चापि त्वं कृपणान् सर्वथैव ह्यस्मद्वाक्यात् कुशलं तात पृच्छेः ॥ ४४ ॥ संजय! जो अनाथ, दुर्बल एवं मूर्खजन सदा अपने शरीरका पोषण करनेके लिये ही प्रयत्न करते हैं, तुम मेरे कहनेसे उन दीनजनोंके पास भी जाकर सब प्रकारसे उनका कुशल-समाचार पूछना ॥ ४४ ॥
ये चाप्यन्ये संश्रिता धार्तराष्ट्रान् नानादिग्भ्योऽभ्यागताः सूतपुत्र । दृष्ट्वा तांश्चैवार्हतश्चापि सर्वान् सम्पृच्छेथाः कुशलं चाव्ययं च ॥ ४५ ॥