भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 2343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 226

संजय! उन्हें यह भी बताना कि 'तात! यह सारा राज्य किसी एकके ही लिये पर्याप्त हो, ऐसी बात नहीं है। हम सब लोग मिलकर एक साथ रहकर सुखपूर्वक जीवन-निर्वाह करें, इसके विपरीत करके आप शत्रुओंके वशमें न पड़ें' ।। ७ ।। तथा भीष्मं शान्तनवं भारतानां पितामहम् । शिरसाभिवदेथास्त्वं मम नाम प्रकीर्तयन् ।। ८ ।। अभिवाद्य च वक्तव्यस्ततोऽस्माकं पितामहः । भवता शन्तनोर्वंशो निमग्नः पुनरुद्धृतः ।। ९ ।। स त्वं कुरु तथा तात स्वमतेन पितामह । यथा जीवन्ति ते पौत्राः प्रीतिमन्तः परस्परम् ।। १० ।। इसी तरह भरतवंशियोंके पितामह शान्तनुनन्दन भीष्मजीको भी मेरा नाम लेते हुए सिर झुकाकर प्रणाम करना और प्रणामके पश्चात् हमारे उन पितामहसे इस प्रकार कहना—'दादाजी! आपने शान्तनुके डूबते हुए वंशका पुनरुद्धार किया था। अब फिर अपनी बुद्धिसे विचार करके कोई ऐसा काम कीजिये, जिससे आपके सभी पौत्र परस्पर प्रेमपूर्वक जीवन बिता सकें' ।। ८—१० ।। तथैव विदुरं ब्रूयाः कुरूणां मन्त्रधारिणम् । अयुद्धं सौम्य भाषस्व हितकामो युधिष्ठिरे ।। ११ ।। संजय! इसी प्रकार कौरवोंके मन्त्री विदुरजीसे कहना—'सौम्य! आप युद्ध न होनेकी ही सलाह दें; क्योंकि आप युधिष्ठिरका हित चाहनेवाले हैं' ।। ११ ।। अथ दुर्योधनं ब्रूया राजपुत्रममर्षणम् । मध्ये कुरूणामासीनमनुनीय पुनः पुनः ।। १२ ।। तदनन्तर कौरवोंकी सभामें बैठे हुए अमर्षमें भरे रहनेवाले राजकुमार दुर्योधनसे बार-बार अनुनय-विनय करके कहना— ।। १२ ।। अपापां यदुपैक्षस्त्वं कृष्णामेतां सभागताम् । तत् दुःखमतितिक्षाम मा वधिष्म कुरूनिति ।। १३ ।। 'तुमने द्रौपदीको बिना किसी अपराधके सभामें बुलाकर जो उसका तिरस्कार किया, उस दुःखको हमलोगोंने इसलिये चुपचाप सह लिया है कि हमें कौरवोंका वध न करना पड़े ।। १३ ।। एवं पूर्वापरान् क्लेशानतितिक्षन्त पाण्डवाः । बलीयांसोऽपि सन्तो यत् तत् सर्वं कुरवो विदुः ।। १४ ।। 'इसी प्रकार पाण्डवोंने अत्यन्त बलिष्ठ होते हुए भी जो (तुम्हारे दिये हुए) पहले और पीछेके सभी क्लेशोंको सहन किया है, उसे सब कौरव जानते हैं ।। १४ ।। यन्नः प्राव्राजयः सौम्य अजिनैः प्रतिवासितान् । तद् दुःखमतितिक्षाम मा वधिष्म कुरूनिति ।। १५ ।।