भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 2277

अर्जुनने गंगानन्दन भीष्मके निकट पहुँचकर उन्हें तीखे बाणोंद्वारा पीड़ित करते हुए बड़ी सावधानीके साथ उनपर चढ़ाई की। ठीक वैसे ही, जैसे वनमें कोई मतवाला हाथी किसी मदोन्मत्त गजराजपर आक्रमण कर रहा हो।। प्रत्युद्ययौ च तं राजा भगदत्तः प्रतापवान्। त्रिधा भिन्नेन नागेन मदान्धेन महाबलः।। ५६ ।। तब प्रतापी एवं महाबली राजा भगदत्तने मदान्ध गजराजपर आरूढ़ हो अर्जुनके ऊपर धावा किया। उस हाथीके कुम्भस्थलमें तीन जगहसे मदकी धारा चू रही थी।। ५६ ।। तमापतन्तं सहसा महेन्द्रगजसंनिभम्। परं यत्नं समास्थाय बीभत्सुः प्रत्यपद्यत।। ५७ ।। देवराज इन्द्रके ऐरावत हाथीके समान उस गजराजको सहसा आते देख अर्जुनने बड़ा यत्न करके उसका सामना किया।। ५७ ।। ततो गजगतो राजा भगदत्तः प्रतापवान्। अर्जुनं शरवर्षेण वारयामास संयुगे।। ५८ ।। तब हाथीपर बैठे हुए प्रतापी राजा भगदत्तने युद्धमें बाणोंकी वर्षा करके अर्जुनको आगे बढ़नेसे रोक दिया।। अर्जुनस्तु ततो नागमायान्तं रजतोपमैः। विमलैरायसैस्तीक्ष्णैर्विध्यत महारणे।। ५९ ।। अर्जुनने भी अपने सामने आते हुए उस हाथीको चाँदीके समान चमकीले लोहमय तीखे बाणोंद्वारा उस महासमरमें बींध डाला।। ५९ ।। शिखण्डिनं च कौन्तेयो याहि याहीत्यचोदयत्। भीष्मं प्रति महाराज जह्येनमिति चाब्रवीत्।। ६० ।। महाराज! कुन्तीकुमार अर्जुन शिखण्डीको बार-बार यह प्रेरणा देते और कहते थे कि तुम भीष्मकी ओर बढ़ो और इन्हें मार डालो।। ६० ।। प्राग्ज्योतिषस्ततो हित्वा पाण्डवं पाण्डुपूर्वज। प्रययौ त्वरितो राजन् द्रुपदस्य रथं प्रति।। ६१ ।। पाण्डुके ज्येष्ठ भ्राता महाराज! तदनन्तर प्राग्ज्योतिष-नरेश भगदत्त पाण्डुनन्दन अर्जुनको छोड़कर तुरंत ही द्रुपदके रथकी ओर चल दिये।। ६१ ।। ततोऽर्जुनो महाराज भीष्ममभ्यद्रवद् द्रुतम्। शिखण्डिनं पुरस्कृत्य ततो युद्धमवर्तत।। ६२ ।। महाराज! तब अर्जुनने शिखण्डीको आगे करके बड़े वेगसे भीष्मपर धावा किया। फिर तो भारी युद्ध छिड़ गया।। ६२ ।। ततस्ते तावकाः शूराः पाण्डवं रभसं युधि। समभ्यधावन् क्रोशन्तस्तदद्भुतमिवाभवत्।। ६३ ।।