महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2287, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंमाननीय नरेश! इस प्रकार रथहीन हुए वे सब महारथी कृपाचार्य, शल्य, विकर्ण, दुःशासन तथा विविंशति अर्जुनसे परास्त हो उस समरभूमिमें इधर-उधर भाग गये ।। ४६ १/२ ।।
पूर्वाह्ने भरतश्रेष्ठ पराजित्य महारथान् ॥ ४७ ॥
प्रजज्वाल रणे पार्थो विधूम इव पावकः ।
भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार दसवें दिनके पूर्वाह्नकालमें उन महारथियोंको पराजित करके कुन्तीकुमार अर्जुन रणभूमिमें धूमरहित अग्निके समान प्रकाशित होने लगे ।। ४७ १/२ ।।
तथैव शरवर्षेण भास्करो रश्मिवानिव ॥ ४८ ॥
अन्यान्पि महाराज तापयामास पार्थिवान् ।
महाराज! इसी प्रकार अंशुमाली सूर्यके समान अन्यान्य राजाओंको भी वे अपने बाणोंकी वर्षासे संतप्त करने लगे ।। ४८ १/२ ।।
पराङ्मुखीकृत्य तथा शरवर्षैर्महारथान् ॥ ४९ ॥
प्रावर्तयत संग्रामे शोणितोदां महानदीम् ।
मध्येन कुरुसैन्यानां पाण्डवानां च भारत ॥ ५० ॥
और भारत! उन सब महारथियोंको बाणवर्षाद्वारा विमुख करके अर्जुनने संग्रामभूमिमें कौरव-पाण्डवोंकी सेनाओंके बीच रक्तकी बहुत बड़ी नदी बहा दी ।। ४९-५० ।।
गजांश्च रथसङ्घांश्च बहुधा रथिभिर्हताः ।
रथांश्च निहता नागैर्हयाश्चैव पदातिभिः ॥ ५१ ॥
रथियोंद्वारा बहुत-से हाथी तथा रथसमूह नष्ट कर दिये गये। हाथियोंने कितने ही रथ चौपट कर दिये और पैदल सिपाहियोंने सवारोंसहित बहुत-से घोड़े मार गिराये ।। ५१ ।।
अन्तराच्छिद्यमानानि शरीराणि शिरांसि च ।
निपेतूर्दिक्षु सर्वासु गजाश्वरथयोधिनाम् ॥ ५२ ॥
हाथी, घोड़े तथा रथोंपर बैठकर युद्ध करनेवाले सैनिकोंके शरीर और मस्तक बीच-बीचसे कटकर सब दिशाओंमें गिर रहे थे ।। ५२ ।।
छन्नमायोधनं राजन् कुण्डलाङ्गदधारिभिः ।
पतितैः पात्यमानैश्च राजपुत्रैर्महारथैः ॥ ५३ ॥
राजन्! वहाँ गिरे और गिराये जाते हुए कुण्डल और अंगदधारी महारथी राजकुमारोंके मृत शरीरोंसे सारी युद्धभूमि आच्छादित हो रही थी ।। ५३ ।।
रथनेमिनिकृत्तैश्च गजैश्चैवावपोथितैः ।
पादाताश्चाप्यधावन्त साश्वाश्च हययोधिनः ॥ ५४ ॥
उनमेंसे कितने ही रथोंके पहियोंसे कट गये थे और कितनोंहीको हाथियोंने अपनी सूँड़ोंसे पकड़कर धरतीपर दे मारा था एवं कितने ही पैदल सैनिक तथा अपने अश्वोंसहित घुड़सवार योद्धा वहाँसे भाग गये थे ।। ५४ ।।