महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैशम्पायन उवाच
एवं प्रतिष्ठाप्य धनंजयस्तं
ततोऽर्थवद् धर्मवच्चैव पार्थः।
उवाच वाक्यं स्वजनप्रहर्षं
वित्रासनं धृतराष्ट्रात्मजानाम्॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस प्रकार कुन्तीपुत्र धनंजयने संजयको जानेकी अनुमति देकर अर्थ और धर्मसे युक्त बात कही, जो स्वजनोंको हर्ष देनेवाली तथा धृतराष्ट्रके पुत्रोंको भयभीत करनेवाली थी।
अर्जुनेन समादिष्टस्तथेत्युक्त्वा तु संजयः।
पार्थानामन्त्रयामास केशवं च यशस्विनम्॥ )
अर्जुनके इस प्रकार आदेश देनेपर संजयने ‘तथास्तु’ कहकर उसे शिरोधार्य किया। तत्पश्चात् उसने अन्य कुन्तीकुमारों तथा यशस्वी भगवान् श्रीकृष्णसे जानेकी अनुमति माँगी।
अनुज्ञातः पाण्डवेन प्रययौ संजयस्तदा।
शासनं धृतराष्ट्रस्य सर्वं कृत्वा महात्मनः॥ १॥
पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी आज्ञा पाकर संजय महामना राजा धृतराष्ट्रके सम्पूर्ण आदेशोंका पालन करके उस समय वहाँसे प्रस्थित हुए॥ १॥
सम्प्राप्य हास्तिनपुरं शीघ्रमेव प्रविश्य च।
अन्तःपुरं समास्थाय द्वाःस्थं वचनमब्रवीत्॥ २॥
हस्तिनापुर पहुँचकर उन्होंने शीघ्र ही राजभवनमें प्रवेश किया और अन्तःपुरके निकट जाकर द्वारपालसे कहा—॥ २॥
आचक्ष्व धृतराष्ट्राय द्वाःस्थ मां समुपागतम्।
सकाशात् पाण्डुपुत्राणां संजयं मा चिरं कृथाः॥ ३॥
‘द्वारपाल! तुम राजा धृतराष्ट्रको मेरे आनेकी सूचना दो और कहो—‘पाण्डवोंके पाससे संजय आया है।' विलम्ब न करो॥ ३॥
जागर्ति चेदभिवदेस्त्वं हि द्वाःस्थ
प्रविशेयं विदितो भूमिपस्य।
निवेद्यमत्रात्ययिकं हि मेऽस्ति
द्वाःस्थोऽथ श्रुत्वा नृपतिं जगाम॥ ४॥
‘द्वारपाल! यदि महाराज जागते हों तो तुम उन्हें मेरा प्रणाम कहना। उनकी सूचना मिल जानेपर मैं भीतर प्रवेश करूँगा। मुझे उनसे एक आवश्यक निवेदन करना है।' यह सुनकर द्वारपाल महाराजके पास गया और इस प्रकार बोला॥ ४॥