भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 2317, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 2317

तदनन्तर लाखों योद्धा युद्धसे विरत होकर जैसे देवता प्रजापतिकी सेवामें उपस्थित होते हैं, उसी प्रकार महात्मा भीष्मके पास आये ॥ ३० ॥ ते तु भीष्मं समासाद्य शयानं भरतर्षभम् । अभिवाद्यावतिष्ठन्त पाण्डवाः कुरुभिः सह ॥ ३१ ॥ वे पाण्डव तथा कौरव बाणशय्यापर सोये हुए भरतश्रेष्ठ भीष्मकी सेवामें पहुँचकर उन्हें प्रणाम करके खड़े हो गये ॥ ३१ ॥ अथ पाण्डून् कुरूंश्चैव प्रणिपत्याग्रतः स्थितान् । अभ्यभाषत धर्मात्मा भीष्मः शान्तनवस्तदा ॥ ३२ ॥ पाण्डव तथा कौरव जब प्रणाम करके उनके सामने खड़े हुए, तब शान्तनुनन्दन धर्मात्मा भीष्मने उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ३२ ॥ स्वागतं वो महाभागाः स्वागतं वो महारथाः । तुष्यामि दर्शनाच्चाहं युष्माकममरोपमाः ॥ ३३ ॥ ‘महाभाग नरेशगण! आपलोगोंका स्वागत है। देवोपम महारथियो! आपका स्वागत है। मैं आपलोगोंके दर्शनसे बहुत संतुष्ट हूँ’ ॥ ३३ ॥ अभिमन्त्र्याथ तानेवं शिरसा लम्बताब्रवीत् । शिरो मे लम्बतेऽत्यर्थमुपधानं प्रदीयताम् ॥ ३४ ॥ इस प्रकार उन सब लोगोंसे स्वागत-भाषण करके अपने लटकते हुए सिरके द्वारा ही वे बोले—‘राजाओ! मेरा सिर बहुत लटक रहा है। इसके लिये आपलोग मुझे तकिया दें’ ॥ ३४ ॥ ततो नृपाः समाजह्रुस्ततूनि च मृदूनि च । उपधानानि मुख्यानि नैच्छत् तानि पितामहः ॥ ३५ ॥ तब राजालोग तत्काल बढ़िया, कोमल और महीन वस्त्रके बने हुए बहुत-से तकिये ले आये; परंतु पितामह भीष्मने उन्हें लेनेकी इच्छा नहीं की ॥ ३५ ॥ अथाब्रवीन्नरव्याघ्रः प्रहसन्निव तान् नृपान् । नैतानि वीरशय्यासु युक्तरूपाणि पार्थिवाः ॥ ३६ ॥ तदनन्तर पुरुषसिंह भीष्मने हँसते हुए-से उन राजाओंसे कहा—‘भूमिपालो! ये तकिये वीरशय्याके अनुरूप नहीं हैं’ ॥ ३६ ॥ ततो वीक्ष्य नरश्रेष्ठमभ्यभाषत पाण्डवम् । धनंजयं दीर्घबाहुं सर्वलोकमहारथम् ॥ ३७ ॥ इसके बाद वे सम्पूर्ण लोकोंके विख्यात महारथी नरश्रेष्ठ महाबाहु पाण्डुपुत्र धनंजयकी ओर देखकर इस प्रकार बोले— ॥ ३७ ॥ धनंजय महाबाहो शिरो मे तात लम्बते । दीयतामुपधानं वै यद् युक्तमिह मन्यसे ॥ ३८ ॥

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