महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंजय बोला— भूपाल! आपको नमस्कार है। नरदेव! मैं संजय हूँ और पाण्डवोंके पास जाकर लौटा हूँ। उदारचित्त पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरने आपको प्रणाम करके आपकी कुशल पूछी है ॥ ८ ॥
स ते पुत्रान् पृच्छति प्रीयमाणः कच्चित् पुत्रैः प्रीयसे नप्तृभिश्च । तथा सुहृद्भिः सचिवैश्च राजन् ये चापि त्वामुपजीवन्ति तैश्च ॥ ९ ॥
उन्होंने बड़ी प्रसन्नताके साथ आपके पुत्रोंका समाचार पूछा है। राजन्! आप अपने पुत्रों, नातियों, सुहृदों, मन्त्रियों तथा जो आपके आश्रित रहकर जीवन-निर्वाह करते हैं, उन सबके साथ आनन्दपूर्वक हैं न? ॥ ९ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
अभिनन्द्य त्वां तात वदामि संजय अजातशत्रुं च सुखेन पार्थम् । कच्चित् स राजा कुशली सपुत्रः सहामात्यः सानुजः कौरवाणाम् ॥ १० ॥
धृतराष्ट्रने कहा— तात संजय! मैं तुम्हारा स्वागत करके पूछता हूँ कि कुन्तीनन्दन अजातशत्रु युधिष्ठिर सुखसे हैं न? क्या कौरवोंके राजा युधिष्ठिर अपने पुत्र, मन्त्री तथा छोटे भाइयोंसहित सकुशल हैं? ॥ १० ॥
संजय उवाच
सहामात्यः कुशली पाण्डुपुत्रो बुभूषते यच्च तेऽग्रेऽऽत्मनोऽभूत् । निर्णीक्तधर्मार्थकरो मनस्वी बहुश्रुतो दृष्टिमाञ्छीलवांश्च ॥ ११ ॥
संजयने कहा— पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर अपने मन्त्रियोंसहित सकुशल हैं और पहले आपके सामने जो उनका राज्य और धन आदि उन्हें प्राप्त था, उसे पुनः वापस लेना चाहते हैं। वे विशुद्धभावसे धर्म और अर्थका सेवन करनेवाले, मनस्वी, विद्वान्, दूरदर्शी और शीलवान् हैं ॥ ११ ॥
परो धर्मात् पाण्डवस्यातृशंस्यं धर्मः परो वित्तचयान्मतोऽस्य । सुखप्रिये धर्महीनेऽनपार्थेऽ- नुरुध्यते भारत तस्य बुद्धिः ॥ १२ ॥