भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 2329

कृष्णो वा देवकीपुत्रो नान्यो वेदेह कश्चन ॥ ४२ ॥ ‘इस संसारमें ऐसा पराक्रम करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। आग्नेय, वारुण, सौम्य, वायव्य, वैष्णव, ऐन्द्र, पाशुपत, ब्राह्म, पारमेष्ठ्य, प्राजापत्य, धात्र, त्वाष्ट्र, सावित्र और वैवस्वत आदि सम्पूर्ण दिव्यास्त्रोंको इस समस्त मानव-जगत्में एकमात्र अर्जुन अथवा देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण जानते हैं। दूसरा कोई यहाँ इन अस्त्रोंको नहीं जानता है ॥ ४०—४२ ॥

अशक्यः पाण्डवस्तात युद्धे जेतुं कथंचन । अमानुषाणि कर्माणि यस्यैतानि महात्मनः ॥ ४३ ॥ तेन सत्त्ववता संख्ये शूरेणाहवशौभिना । कृतिना समरे राजन् संधिर्भवतु मा चिरम् ॥ ४४ ॥ ‘तात! पाण्डुपुत्र अर्जुनको युद्धमें किसी प्रकार भी जीतना असम्भव है। जिन महामनस्वी पुरुषके ये अलौकिक कर्म प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं; जो धैर्यवान्, युद्धमें शूरता दिखानेवाले तथा संग्राममें सुशोभित होनेवाले हैं, राजन्! उन अस्त्र-विद्याके विद्वान् अर्जुनके साथ इस समरभूमिमें तुम्हारी शीघ्र संधि हो जानी चाहिये। इसमें विलम्ब न हो ॥ ४३-४४ ॥

यावत् कृष्णो महाबाहुः स्वाधीनः कुरुसत्तम । तावत् पार्थेन शूरेण संधिस्ते तात युज्यताम् ॥ ४५ ॥ ‘तात! कुरुश्रेष्ठ! जबतक महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण अपने लोगोंके प्रेमके अधीन हैं, तभीतक शूरवीर अर्जुनके साथ तुम्हारी संधि हो जाय तो ठीक है ॥ ४५ ॥

यावन्न ते चमूः सर्वाः शरैः संनतपर्वभिः । नाशयत्यर्जुनस्तावत् संधिस्ते तात युज्यताम् ॥ ४६ ॥ ‘तात! जबतक अर्जुन झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा तुम्हारी सारी सेनाका विनाश नहीं कर डालते हैं, तभीतक उनके साथ तुम्हारी संधि हो जानी चाहिये ॥ ४६ ॥

यावत् तिष्ठन्ति समरे हतशेषाः सहोदराः । नृपाश्च बहवो राजंस्तावत् संधिः प्रयुज्यताम् ॥ ४७ ॥ ‘राजन्! इस समरभूमिमें मरनेसे बचे हुए तुम्हारे सहोदर भाई जबतक मौजूद हैं और जबतक बहुत-से नरेश भी जीवन धारण कर रहे हैं, तभीतक तुम अर्जुनके साथ संधि कर लो ॥ ४७ ॥

न निर्दहति ते यावत् क्रोधदीप्तेक्षणश्चमूम् । युधिष्ठिरो रणे तावत् संधिस्ते तात युज्यताम् ॥ ४८ ॥ ‘तात! जबतक युधिष्ठिर रणभूमिमें क्रोधसे प्रज्वलितनेत्र होकर तुम्हारी सारी सेनाको भस्म नहीं कर डालते हैं, तभीतक उनके साथ तुम्हें संधि कर लेनी चाहिये ॥ ४८ ॥

नकुलः सहदेवश्च भीमसेनश्च पाण्डवः ।