भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 2331

मोहाविष्टः प्रतिपत्स्यस्यबुद्ध्या । तप्स्यस्यन्ते एतदन्ताः स्थ सर्वे सत्यामेतां भारतीमीरयामि ॥ ५५ ॥ 'दुर्योधन! यदि तुम मोहवश अपनी मूर्खताके कारण मेरे इस समयोचित वचनको नहीं मानोगे तो अन्तमें पछताओगे और इस युद्धमें ही तुम सब लोगोंका अन्त हो जायगा। यह मैं तुमसे सच्ची बात कह रहा हूँ' ॥ ५५ ॥

एतद् वाक्यं सौहृदादापगेयो मध्ये राज्ञां भारतं श्रावयित्वा । तूष्णीमासीच्छल्यसंतप्तमर्मा योज्यात्मानं वेदनां संनियम्य ॥ ५६ ॥ गंगानन्दन भीष्म समस्त राजाओंके बीच सौहार्दवश दुर्योधनको यह बात सुनाकर मौन हो गये। बाणोंसे उनके मर्मस्थलोंमें अत्यन्त पीड़ा हो रही थी। उन्होंने उस व्यथाको किसी प्रकार काबूमें करके अपने मनको परमात्माके चिन्तनमें लगा दिया ॥ ५६ ॥

संजय उवाच

धर्मार्थसहितं वाक्यं श्रुत्वा हितमनामयम् । नारोचयत पुत्रस्ते मुमूर्षुरिव भेषजम् ॥ ५७ ॥ संजय कहते हैं—राजन्! जैसे मरणासन्न पुरुषको कोई दवा अच्छी नहीं लगती है, उसी प्रकार महात्मा भीष्मका वह धर्म और अर्थसे युक्त परम हितकर और निर्दोष वचन भी आपके पुत्रको पसंद नहीं आया ॥ ५७ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि दुर्योधनं प्रति भीष्मवाक्ये एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें दुर्योधनके प्रति भीष्मका कथनविषयक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२१ ॥