महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2334, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंन त्वया सदृशः कश्चित् पुरुषेष्वमरोपम । कुलभेदभयाच्चाहं सदा परुषमुक्तवान् ॥ १५ ॥ ‘देवोपम वीर! मनुष्योंमें तुम्हारे समान कोई नहीं है। मैं सदा अपने कुलमें फूट पड़नेके डरसे तुम्हें कटुवचन सुनाता रहा ॥ १५ ॥ इष्वस्त्रे चास्त्रसंधाने लाघवेऽस्त्रबले तथा । सदृशः फाल्गुनेनासि कृष्णेन च महात्मना ॥ १६ ॥ ‘बाण चलाने, दिव्यास्त्रोंका संधान करने, फुर्ती दिखाने तथा अस्त्रबलमें तुम अर्जुन तथा महात्मा श्रीकृष्णके समान हो ॥ १६ ॥ कर्ण काशिपुरं गत्वा त्वयैकेन धनुष्मता । कन्यार्थे कुरुराजस्य राजानो मृदिता युधि ॥ १७ ॥ ‘कर्ण! तुमने कुरुराज दुर्योधनके लिये कन्या लानेके निमित्त अकेले काशीपुरमें जाकर केवल धनुषकी सहायतासे वहाँ आये हुए समस्त राजाओंको युद्धमें परास्त कर दिया था ॥ १७ ॥ तथा च बलवान् राजा जरासंधो दुरासदः । समरे समरश्लाघिन् न त्वया सदृशोऽभवत् ॥ १८ ॥ ‘युद्धकी श्लाघा रखनेवाले वीर! यद्यपि राजा जरासंध दुर्जय एवं बलवान् था, तथापि वह रणभूमिमें तुम्हारी समानता न कर सका ॥ १८ ॥ ब्रह्मण्यः सत्त्वयोधी च तेजसा च बलेन च । देवगर्भसमः संख्ये मनुष्यैरधिको युधि ॥ १९ ॥ ‘तुम ब्राह्मणभक्त, धैर्यपूर्वक युद्ध करनेवाले तथा तेज और बलसे सम्पन्न हो। संग्रामभूमिमें देवकुमारोंके समान जान पड़ते हो और प्रत्येक युद्धमें मनुष्योंसे अधिक पराक्रमी हो ॥ १९ ॥ व्यपनीतोऽद्य मन्युर्मे यस्त्वां प्रति पुरा कृतः । दैवं पुरुषकारेण न शक्यमतिवर्तितुम् ॥ २० ॥ ‘मैंने पहले जो तुम्हारे प्रति क्रोध किया था, वह अब दूर हो गया है; क्योंकि प्रारब्धके विधानको कोई पुरुषार्थद्वारा नहीं टाल सकता ॥ २० ॥ सोदर्याः पाण्डवा वीरा भ्रातरस्तेऽरिसूदन । संगच्छ तैर्महाबाहो मम चेदिच्छसि प्रियम् ॥ २१ ॥ ‘शत्रुसूदन! वीर पाण्डव तुम्हारे सगे भाई हैं। महाबाहो! यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो अपने उन भाइयोंसे मिल जाओ ॥ २१ ॥ मया भवतु निर्वृत्तं वैरमादित्यनन्दन । पृथिव्यां सर्वराजानो भवन्त्वद्य निरामयाः ॥ २२ ॥