भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 2337, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 2337

अहं त्वामनुजानामि यदिच्छसि तदाप्नुहि । क्षत्रधर्मजिताँल्लोकानवाप्स्यसि धनंजयात् ॥ ३६ ॥ कर्ण! मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ। तुम जो चाहते हो, वह प्राप्त करो। धनंजयके हाथसे मारे जानेपर तुम्हें क्षत्रियधर्मके पालनसे प्राप्त होनेवाले लोकोंकी उपलब्धि होगी ॥ ३६ ॥ युध्यस्व निरहङ्कारो बलवीर्यव्यपाश्रयः । धर्म्‍याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ ३७ ॥ तुम अभिमानशून्य होकर बल और पराक्रमका सहारा ले युद्ध करो, क्षत्रियके लिये धर्मानुकूल युद्धसे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी साधन नहीं है ॥ ३७ ॥ प्रशमे हि कृतो यत्नः सुमहान् सुचिरं मया । न चैव शक्तितः कर्तुं कर्ण सत्यं ब्रवीमि ते ॥ ३८ ॥ कर्ण! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ। मैंने कौरवों और पाण्डवोंमें शान्ति स्थापित करनेके लिये दीर्घकालतक महान् प्रयत्न किया था; किंतु मैं उसमें कृतकार्य न हो सका ॥ ३८ ॥

संजय उवाच इत्युक्तवति गाङ्गेये अभिवाद्योपमन्त्र्य च । राधेयो रथमारुह्य प्रायात् तव सुतं प्रति ॥ ३९ ॥ संजय कहते हैं—राजन्! गंगानन्दन भीष्मके ऐसा कहनेपर राधानन्दन कर्ण उन्हें प्रणाम करके उनकी आज्ञा ले रथपर आरूढ़ हो आपके पुत्र दुर्योधनके पास चला गया ॥ ३९ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीष्मकर्णसंवादे द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें भीष्म-कर्णसंवादविषयक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२२ ॥ [दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४० १/३ श्लोक हैं।]

॥ भीष्मपर्व सम्पूर्णम् ॥

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