महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2339, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रवणमहिमा
वैशम्पायन उवाच
इत्येतद् बहुवृत्तान्तं भीष्मपर्वाखिलं मया ।
शृण्वते ते महाराज प्रोक्तं पापहरं शुभम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**महाराज! बहुत-से वृत्तान्तोंसे भरा हुआ यह सम्पूर्ण भीष्मपर्व मैंने तुमसे कहा है और तुमने श्रोता बनकर सुना है। यह पर्व सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला और शुभ है ॥ १ ॥
यः श्रावयेत् सदा राजन् ब्राह्मणान् वेदपारगान् ।
श्रद्धावन्तश्च ये चापि श्रोष्यन्ति मनुजा भुवि ॥ २ ॥
विधूय सर्वपापानि विहायान्ते कलेवरम् ।
प्रयान्ति तत् पदं विष्णोर्यत् प्राप्य न निवर्तते ॥ ३ ॥
राजन्! जो सदा वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंको इस पर्वकी कथा सुनायेगा और जो मनुष्य इस भूतलपर श्रद्धापूर्वक इस पर्वको सुनेंगे, वे सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करके अन्तमें यह शरीर छोड़कर भगवान् विष्णुके उस परमपदको प्राप्त कर लेंगे, जहाँ जाकर जीव इस जगत्में नहीं लौटता है ॥ २-३ ॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन भारतं भरतर्षभ ।
शृणुयात् सिद्धिमन्विच्छन्निह वामुत्र मानवः ॥ ४ ॥
भरतश्रेष्ठ! अतः इस लोक या परलोकमें सिद्धिकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य पूर्ण प्रयत्नपूर्वक महाभारतको अवश्य सुने ॥ ४ ॥
भोजनं भोजयेद् विप्रान् गन्धमाल्यैरलंकृतान् ।
भीष्मपर्वणि राजेन्द्र दद्यात् पानीयमुत्तमम् ॥ ५ ॥
राजेन्द्र! भीष्मपर्व सुन लेनेपर मनुष्य ब्राह्मणोंको गन्ध और माल्य आदिसे अलंकृत करके उत्तम भोजन कराये तथा पवित्र जलका दान करे ॥ ५ ॥