महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 268, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअवृत्तिर्भयमन्त्यानां मध्यानां मरणाद् भयम् । उत्तमानां तु मर्त्यानामवमानात् परं भयम् ॥ ५२ ॥ अधम पुरुषोंको जीविका न होनेसे भय लगता है, मध्यम श्रेणीके मनुष्योंको मृत्युसे भय होता है; परंतु उत्तम पुरुषोंको अपमानसे ही महान् भय होता है ॥ ५२ ॥ ऐश्वर्यमदपापिष्ठा मदाः पानमदादयः । ऐश्वर्यमदमत्तो हि नापतित्वा विबुध्यते ॥ ५३ ॥ यों तो (मादक वस्तुओंके) पीनेका नशा आदि भी नशा ही है, किंतु ऐश्वर्यका नशा तो बहुत ही बुरा है; क्योंकि ऐश्वर्यके मदसे मतवाला पुरुष भ्रष्ट हुए बिना होशमें नहीं आता ॥ ५३ ॥ इन्द्रियैरिन्द्रियार्थेषु वर्तमानेरनिग्रहैः । तैरयं ताप्यते लोको नक्षत्राणि ग्रहैरिव ॥ ५४ ॥ वशमें न होनेके कारण विषयोंमें रमनेवाली इन्द्रियोंसे यह संसार उसी भाँति कष्ट पाता है, जैसे सूर्य आदि ग्रहोंसे नक्षत्र तिरस्कृत हो जाते हैं ॥ ५४ ॥ यो जितः पञ्चवर्गेण सहजेनात्मकर्षिणा । आपदस्तस्य वर्धन्ते शुक्लपक्ष इवोडुराट् ॥ ५५ ॥ जो मनुष्य जीवोंको वशमें करनेवाली सहज पाँच इन्द्रियोंसे जीत लिया गया, उसकी आपत्तियाँ शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति बढ़ती हैं ॥ ५५ ॥ अविजित्य य आत्मानममात्यान् विजिगीषते । अमित्रान् वाजितामात्यः सोऽवशः परिहीयते ॥ ५६ ॥ इन्द्रियोंसहित मनको जीते बिना ही जो मन्त्रियोंको जीतनेकी इच्छा करता है या मन्त्रियोंको अपने अधीन किये बिना शत्रुको जीतना चाहता है, उस अजितेन्द्रिय पुरुषको सब लोग त्याग देते हैं ॥ ५६ ॥ आत्मानमेव प्रथमं द्वेष्यरूपेण यो जयेत् । ततोऽमात्यानमित्रांश्च न मोघं विजिगीषते ॥ ५७ ॥ जो पहले इन्द्रियोंसहित मनको ही शत्रु समझकर जीत लेता है, उसके बाद यदि वह मन्त्रियों तथा शत्रुओंको जीतनेकी इच्छा करे तो उसे सफलता मिलती है ॥ ५७ ॥ वश्येन्द्रियं जितात्मानं धृतदण्डं विकारिषु । परीक्ष्य कारिणं धीरमत्यन्तं श्रीर्निषेवते ॥ ५८ ॥ इन्द्रियों तथा मनको जीतनेवाले, अपराधियोंको दण्ड देनेवाले और जाँच-परखकर काम करनेवाले धीर पुरुषकी लक्ष्मी अत्यन्त सेवा करती है ॥ ५८ ॥ रथः शरीरं पुरुषस्य राज- न्नात्मा नियन्तेन्द्रियाण्यस्य चाश्वाः । तैरप्रमत्तः कुशली सदश्वै-