महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 287, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो बुद्धिमान् पुरुषोंसे सद्बुद्धि प्राप्त करता है, वही पण्डित है; क्योंकि बुद्धिमान् पुरुष ही धर्म और अर्थको प्राप्तकर अनायास ही अपनी उन्नति करनेमें समर्थ होता है ॥ ६६ ॥ दिवसेनैव तत् कुर्याद् येन रात्रौ सुखं वसेत् । अष्टमासेन तत् कुर्याद् येन वर्षाः सुखं वसेत् ॥ ६७ ॥ दिनभरमें ही वह कार्य कर ले, जिससे रातमें सुखसे रह सके और आठ महीनोंमें वह कार्य कर ले, जिससे वर्षाके चार महीने सुखसे व्यतीत कर सके ॥ ६७ ॥ पूर्वे वयसि तत् कुर्याद् येन वृद्धः सुखं वसेत् । यावज्जीवेन तत् कुर्याद् येन प्रेत्य सुखं वसेत् ॥ ६८ ॥ पहली अवस्थामें वह काम करे, जिससे वृद्धावस्थामें सुखपूर्वक रह सके और जीवनभर वह कार्य करे, जिससे मरनेके बाद भी (परलोकमें) सुखसे रह सके ॥ ६८ ॥ जीर्णमन्नं प्रशंसन्ति भार्यां च गतयौवनाम् । शूरं विजितसंग्रामं गतपारं तपस्विनम् ॥ ६९ ॥ सज्जन पुरुष पच जानेपर अन्नकी, (निष्कलंक) यौवन बीत जानेपर स्त्रीकी, संग्राम जीत लेनेपर शूरकी और संसारसागरको पार कर लेनेपर तपस्वीकी प्रशंसा करते हैं ॥ ६९ ॥ धनेनाधर्मलब्धेन यच्छिद्रमपिधीयते । असंवृतं तद् भवति ततोऽन्यदवदीर्यते ॥ ७० ॥ अधर्मसे प्राप्त हुए धनके द्वारा जो दोष छिपाया जाता है, वह तो छिपता नहीं; (परंतु दोष छिपानेके कारण) उससे भिन्न और नया दोष प्रकट हो जाता है ॥ ७० ॥ गुरुरात्मवतां शास्ता शास्ता राजा दुरात्मनाम् । अथ प्रच्छन्नपापानां शास्ता वैवस्वतो यमः ॥ ७१ ॥ अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें करनेवाले शिष्योंके शासक गुरु हैं, दुष्टोंके शासक राजा हैं और छिपे-छिपे पाप करनेवालोंके शासक सूर्यपुत्र यमराज हैं ॥ ७१ ॥ ऋषीणां च नदीनां च कुलानां च महात्मनाम् । प्रभवो नाधिगन्तव्यः स्त्रीणां दुश्चरितस्य च ॥ ७२ ॥ ऋषि, नदी, वंश एवं महात्माओंका तथा स्त्रियोंके दुश्चरित्रका उत्पत्तिस्थान नहीं जाना जा सकता ॥ ७२ ॥ द्विजातिपूजाभिरतो दाता ज्ञातिषु चार्जवी । क्षत्रियः शीलभाग् राजंश्चिरं पालयते महीम् ॥ ७३ ॥ राजन्! ब्राह्मणोंकी सेवा-पूजामें संलग्न रहनेवाला, दाता, कुटुम्बीजनोंके प्रति कोमलताका बर्ताव करने-वाला और शीलवान् राजा चिरकालतक पृथ्वीका पालन करता है ॥ ७३ ॥ सुवर्णपुष्पां पृथिवीं चिन्वन्ति पुरुषास्त्रयः ।