महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपर्युक्त सभी गुणोंसे बढ़कर शोभा पाता है ।। ३२ ।। गुणा दश स्नानशीलं भजन्ते बलं रूपं स्वरवर्णप्रशुद्धिः । स्पर्शश्च गन्धश्च विशुद्धता च श्रीः सौकुमार्यं प्रवराश्च नार्यः ।। ३३ ।। नित्य स्नान करनेवाले मनुष्यको बल, रूप, मधुरस्वर, उज्ज्वल वर्ण, कोमलता, सुगन्ध, पवित्रता, शोभा, सुकुमारता और सुन्दरी स्त्रियाँ—ये दस लाभ प्राप्त होते हैं ।। ३३ ।। गुणाश्च षण्मितभुक्तं भजन्ते आरोग्यमायुश्च बलं सुखं च । अनाविलं चास्य भवत्यपत्यं न चैनमाद्यून इति क्षिपन्ति ।। ३४ ।। थोड़ा भोजन करनेवालेको निम्नांकित छः गुण प्राप्त होते हैं—आरोग्य, आयु, बल और सुख तो मिलते ही हैं, उसकी संतान उत्तम होती है तथा 'यह बहुत खानेवाला है' ऐसा कहकर लोग उसपर आक्षेप नहीं करते ।। ३४ ।। अकर्मशीलं च महाशनं च लोकद्विष्टं बहुमायं नृशंसम् । अदेशकालज्ञमनिष्टवेष- मेतान् गृहे न प्रतिवासयेत ।। ३५ ।। अकर्मण्य, बहुत खानेवाले, सब लोगोंसे वैर करनेवाले, अधिक मायावी, क्रूर, देश-कालका ज्ञान न रखनेवाले और निन्दित वेष धारण करनेवाले मनुष्यको कभी अपने घरमें न ठहरने दे ।। ३५ ।। कदर्यमाक्रोशकमश्रुतं च वनौकसं धूर्तममान्यमानिनम् । निष्ठुरिणं कृतवैरं कृतघ्न- मेतान् भृशार्तोऽपि न जातु याचेत् ।। ३६ ।। बहुत दुःखी होनेपर भी कृपण, गाली बकनेवाले, मूर्ख, जंगलमें रहनेवाले, धूर्त, नीचसेवी, निर्दयी, वैर बाँधनेवाले और कृतघ्नसे कभी सहायताकी याचना नहीं करनी चाहिये ।। ३६ ।। संक्लिष्टकर्माणमतिप्रमादं नित्यानृतं चादृढभक्तिकं च । विसृष्टरागं पटुमानिनं चा- प्येतान् न सेवेत नराधमान् षट् ।। ३७ ।।