भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 318

भारत! जो मित्र न हो, मित्र होनेपर भी पण्डित न हो, पण्डित होनेपर भी जिसका मन वशमें न हो, वह अपनी गुप्त मन्त्रणा जाननेके योग्य नहीं है ।। १८ १/३ ।। नापरीक्ष्य महीपालः कुर्यात् सचिवमात्मनः ।। १९ ।। अमात्ये ह्यर्थलिप्सा च मन्त्ररक्षणमेव च । कृतानि सर्वकार्याणि यस्य पारिषदा विदुः ।। २० ।। धर्मे चार्थे च कामे च स राजा राजसत्तमः । गूढमन्त्रस्य नृपतेस्तस्य सिद्धिरसंशयम् ।। २१ ।। राजा अच्छी तरह परीक्षा किये बिना किसीको अपना मन्त्री न बनावे; क्योंकि धनकी प्राप्ति और मन्त्रकी रक्षाका भार मन्त्रीपर ही रहता है। जिसके धर्म, अर्थ और कामविषयक सभी कार्योंको पूर्ण होनेके बाद ही सभासद्गण जान पाते हैं, वही राजा समस्त राजाओंमें श्रेष्ठ है। अपने मन्त्रको गुप्त रखनेवाले उस राजाको निस्संदेह सिद्धि प्राप्त होती है ।। १९—२१ ।।

अप्रशस्तानि कार्याणि यो मोहादनुतिष्ठति । स तेषां विपरिभ्रंशाद् भ्रंश्यते जीवितादपि ।। २२ ।। जो मोहवश बुरे (शास्त्रनिषिद्ध) कर्म करता है, वह उन कार्योंका विपरीत परिणाम होनेसे अपने जीवनसे भी हाथ धो बैठता है ।। २२ ।।

कर्मणां तु प्रशस्तानामनुष्ठानं सुखावहम् । तेषामेवाननुष्ठानं पश्चात्तापकरं मतम् ।। २३ ।। उत्तम कर्मोंका अनुष्ठान तो सुख देनेवाला होता है, किंतु उन्हींका अनुष्ठान न किया जाय तो वह पश्चात्तापका कारण माना गया है ।। २३ ।।

अनधीत्य यथा वेदान् न विप्रः श्राद्धमर्हति । एवमश्रुतषाड्गुण्यो न मन्त्रं श्रोतुमर्हति ।। २४ ।। जैसे वेदोंको पढ़े बिना ब्राह्मण श्राद्धकर्म करवानेका अधिकारी नहीं होता, उसी प्रकार (सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय नामक) छः गुणोंको जाने बिना कोई गुप्त मन्त्रणा सुननेका अधिकारी नहीं होता ।। २४ ।।

स्थानवृद्धिक्षयज्ञस्य षाड्गुण्यविदितात्मनः । अनवज्ञातशीलस्य स्वाधीना पृथिवी नृप ।। २५ ।। राजन्! जो सन्धि, विग्रह आदि छः गुणोंकी जानकारीके कारण प्रसिद्ध है, स्थिति, वृद्धि और ह्रासको जानता है तथा जिसके स्वभावकी सब लोग प्रशंसा करते हैं, उसी राजाके अधीन पृथिवी रहती है ।। २५ ।।

अमोघक्रोधहर्षस्य स्वयं कृत्यान्ववेक्षिणः । आत्मप्रत्ययकोशस्य वसुदैव वसुन्धरा ।। २६ ।।