महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 330, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै ।। ५७ ।। नातः श्रीमत्तरं किंचिदन्यत् पथ्यतमं मतम् । प्रभविष्णोर्यथा तात क्षमा सर्वत्र सर्वदा ।। ५८ ।। तात समर्थ पुरुषके लिये सब जगह और सब समयमें क्षमाके समान हितकारक और अत्यन्त श्रीसम्पन्न बनानेवाला उपाय दूसरा नहीं माना गया है ।। ५८ ।। क्षमेदशक्तः सर्वस्य शक्तिमान् धर्मकारणात् । अर्थानर्थौ समौ यस्य तस्य नित्यं क्षमा हिता ।। ५९ ।। जो शक्तिहीन है, वह तो सबपर क्षमा करे ही; जो शक्तिमान् है, वह भी धर्मके लिये क्षमा करे तथा जिसकी दृष्टिमें अर्थ और अनर्थ दोनों समान हैं, उसके लिये तो क्षमा सदा ही हितकारिणी होती है ।। ५९ ।। यत् सुखं सेवमानोऽपि धर्मार्थाभ्यां न हीयते । कामं तदुपसेवेत न मूढव्रतमाचरेत् ।। ६० ।। जिस सुखका सेवन करते रहनेपर भी मनुष्य धर्म और अर्थसे भ्रष्ट नहीं होता, उसका यथेष्ट सेवन करे; किंतु मूढव्रत (निद्रा-प्रमादादिका सेवन) न करे ।। ६० ।। दुःखार्तेषु प्रमत्तेषु नास्तिकेष्बलसेषु च । न श्रीर्वसत्यदान्तेषु ये चोत्साहविवर्जिताः ।। ६१ ।। जो दुःखसे पीड़ित, प्रमादी, नास्तिक, आलसी, अजितेन्द्रिय और उत्साहरहित हैं, उनके यहाँ लक्ष्मीका वास नहीं होता ।। ६१ ।। आर्जवेन नरं युक्तमार्जवात् सव्यपत्रपम् । अशक्तं मन्यमानास्तु धर्षयन्ति कुबुद्धयः ।। ६२ ।। दुष्ट बुद्धिवाले लोग सरलतासे युक्त और सरलताके ही कारण लज्जाशील मनुष्यको अशक्त मानकर उसका तिरस्कार करते हैं ।। ६२ ।। अत्यार्यमतिदातारमतिशूरमतिव्रतम् । प्रज्ञाभिमानिनं चैव श्रीर्भयान्नोपसर्पति ।। ६३ ।। अत्यन्त श्रेष्ठ, अतिशय दानी, अतीव शूरवीर, अधिक व्रत-नियमोंका पालन करनेवाले और बुद्धिके घमंडमें चूर रहनेवाले मनुष्यके पास लक्ष्मी भयके मारे नहीं जाती ।। ६३ ।। न चातिगुणवत्स्वेषा नात्यन्तं निर्गुणेषु च । नैषा गुणान् कामयते नैर्गुण्यान्नानुरज्यते । उन्मत्ता गौरिवान्धा श्रीः क्वचिदेवावतिष्ठते ।। ६४ ।। लक्ष्मी न तो अत्यन्त गुणवानोंके पास रहती है और न बहुत निर्गुणोंके पास। यह न तो बहुत-से गुणोंको चाहती है और न गुणहीनताके प्रति ही अनुराग रखती है। उन्मत्त गौकी भाँति यह अन्धी लक्ष्मी कहीं-कहीं ही ठहरती है ।। ६४ ।। अग्निहोत्रफला वेदाः शीलवृत्तफलं श्रुतम् ।