महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 332, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौरे कृतघ्ने विश्वासो न कार्यो न च नास्तिके ॥ ७३ ॥ स्त्रीलम्पट, आलसी, डरपोक, क्रोधी, पुरुषत्वके अभिमानी, चोर, कृतघ्न और नास्तिकका विश्वास नहीं करना चाहिये ॥ ७३ ॥
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः । चत्वारि सम्प्रवर्धन्ते कीर्तिरायुर्यशो बलम् ॥ ७४ ॥ जो नित्य गुरुजनोंको प्रणाम करता है और वृद्ध पुरुषोंकी सेवामें लगा रहता है, उसकी कीर्ति, आयु, यश और बल—ये चारों बढ़ते हैं ॥ ७४ ॥
अतिक्लेशेन येऽर्थाः स्युर्धर्मस्यातिक्रमेण वा । अरेर्वा प्रणिपातेन मा स्म तेषु मनः कृथाः ॥ ७५ ॥ जो धन अत्यन्त क्लेश उठानेसे, धर्मका उल्लंघन करनेसे अथवा शत्रुके सामने सिर झुकानेसे प्राप्त होता हो, उसमें आप मन न लगाइये ॥ ७५ ॥
अविद्यः पुरुषः शोच्यः शोच्यं मैथुनमप्रजम् । निराहाराः प्रजाः शोच्याः शोच्यं राष्ट्रमराजकम् ॥ ७६ ॥ विद्याहीन पुरुष, सन्तानोत्पत्तिरहित स्त्रीप्रसंग, आहार न पानेवाली प्रजा और बिना राजाके राष्ट्रके लिये शोक करना चाहिये ॥ ७६ ॥
अध्वा जरा देहवतां पर्वतानां जलं जरा । असम्भोगो जरा स्त्रीणां वाक्शल्यं मनसो जरा ॥ ७७ ॥ अधिक राह चलना देहधारियोंके लिये दुःखरूप बुढ़ापा है, बराबर पानी गिरना पर्वतोंका बुढ़ापा है, सम्भोगसे वंचित रहनेका दुःख स्त्रियोंके लिये बुढ़ापा है और वचन-रूपी बाणोंका आघात मनके लिये बुढ़ापा है ॥ ७७ ॥
अनाम्नायमला वेदा ब्राह्मणस्याव्रतं मलम् ॥ ७८ ॥ मलं पृथिव्या बाह्लीकाः पुरुषस्यानृतं मलम् । कौतूहलमला साध्वी विप्रवासमलाः स्त्रियः ॥ ७९ ॥ अभ्यास न करना वेदोंका मल है; ब्राह्मणोचित नियमोंका पालन न करना ब्राह्मणका मल है, बाह्लीकदेश (बलखबुखारा) पृथ्वीका मल है तथा झूठ बोलना पुरुषका मल है, क्रीड़ा एवं हास-परिहासकी उत्सुकता पतिव्रता स्त्रीका मल है और पतिके बिना परदेशमें रहना स्त्रीमात्रका मल है ॥ ७८-७९ ॥
सुवर्णस्य मलं रूप्यं रूप्यस्यापि मलं त्रपु । ज्ञेयं त्रपुमलं सीसं सीसस्यापि मलं मलम् ॥ ८० ॥ सोनेका मल है चाँदी, चाँदीका मल है राँगा, राँगेका मल है सीसा और सीसेका भी मल है मैलापन ॥ ८० ॥
न स्वप्नेन जयेन्निद्रां न कामेन जयेत् स्त्रियः । नेन्धनेन जयेदग्निं न पानेन सुरां जयेत् ॥ ८१ ॥