महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 335, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंआलस्य, मद-मोह, चंचलता, गोष्ठी, उद्दण्डता, अभिमान और स्वार्थत्यागका अभाव— ये सात विद्यार्थियों-के लिये सदा ही दोष माने गये हैं ॥ ५ ॥ सुखार्थिनः कुतो विद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम् । सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम् ॥ ६ ॥ सुख चाहनेवालेको विद्या कहाँसे मिले? विद्या चाहनेवालेके लिये सुख नहीं है; सुखकी चाह हो तो विद्याको छोड़े और विद्या चाहे तो सुखका त्याग करे ॥ नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां नापगानां महोदधिः । नान्तकः सर्वभूतानां न पुंसां वामलोचना ॥ ७ ॥ ईंधनसे आगकी, नदियोंसे समुद्रकी, समस्त प्राणियोंसे मृत्युकी और पुरुषोंसे कुलटा स्त्रीकी कभी तृप्ति नहीं होती ॥ ७ ॥ आशा धृतिं हन्ति समृद्धिमन्तकः क्रोधः श्रियं हन्ति यशः कदर्यता । अपालनं हन्ति पशूंश्च राज- न्नेकः क्रुद्धो ब्राह्मणो हन्ति राष्ट्रम् ॥ ८ ॥ आशा धैर्यको, यमराज समृद्धिको, क्रोध लक्ष्मीको, कृपणता यशको और सार-सँभालका अभाव पशुओंको नष्ट कर देता है, परंतु राजन्! ब्राह्मण यदि अकेला ही क्रुद्ध हो जाय तो सम्पूर्ण राष्ट्रका नाश कर देता है ॥ ८ ॥ अजाश्व कांस्यं रजतं च नित्यं मध्वाकर्षः शकुनिः श्रोत्रियश्च । वृद्धो ज्ञातिरवसन्नः कुलीन एतानि ते सन्तु गृहे सदैव ॥ ९ ॥ बकरियाँ, काँसेका पात्र, चाँदी, मधु, धनुष, पक्षी, वेदवेत्ता ब्राह्मण, बूढ़ा कुटुम्बी और विपत्तिग्रस्त कुलीन पुरुष—ये सब आपके घरमें सदा मौजूद रहें ॥ ९ ॥ अजोक्षा चन्दनं वीणा आदर्शो मधुसर्पिषी । विषमौदुम्बरं शङ्खः स्वर्णनाभोऽथ रोचना ॥ १० ॥ गृहे स्थापयितव्यानि धन्यानि मनुरब्रवीत् । देवब्राह्मणपूजार्थमतिथीनां च भारत ॥ ११ ॥ भारत! मनुजीने कहा है कि देवता, ब्राह्मण तथा अतिथियोंकी पूजाके लिये बकरी, बैल, चन्दन, वीणा, दर्पण, मधु, घी, जल, ताँबेके बर्तन, शंख, शालग्राम और गोरोचन—ये सब वस्तुएँ घरपर रखनी चाहिये ॥ १०-११ ॥ इदं च त्वां सर्वपरं ब्रवीमि पुण्यं पदं तात महाविशिष्टम् । न जातु कामान्न भयान्न लोभाद्