महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 337, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपुष्पानफलान् वृक्षान् यथा तात पतत्रिणः ॥ १७ ॥ तात! बिना फल-फूलके वृक्षको जैसे पक्षी छोड़ देते हैं, उसी प्रकार उस प्रेतको उसके जातिवाले, सुहृद् और पुत्र चितामें छोड़कर लौट आते हैं ॥ १७ ॥ अग्नौ प्रास्तं तु पुरुषं कर्मान्वेति स्वयंकृतम् । तस्मात् तु पुरुषो यत्नाद् धर्मं संचिनुयाच्छनैः ॥ १८ ॥ अग्निमें डाले हुए उस पुरुषके पीछे तो केवल उसका अपना किया हुआ बुरा या भला कर्म ही जाता है। इसलिये पुरुषको चाहिये कि वह धीरे-धीरे प्रयत्नपूर्वक धर्मका ही संग्रह करे ॥ १८ ॥ अस्माल्लोकादूर्ध्वममुष्य चाधो महत् तमस्तिष्ठति ह्यन्धकारम् । तद् वै महामोहनमिन्द्रियाणां बुध्यस्व मा त्वां प्रलभेत राजन् ॥ १९ ॥ इस लोक और परलोकसे ऊपर और नीचेतक सर्वत्र अज्ञानरूप महान् अन्धकार फैला हुआ है। वह इन्द्रियोंको महान् मोहमें डालनेवाला है। राजन्! आप इसको जान लीजिये, जिससे यह आपका स्पर्श न कर सके ॥ १९ ॥ इदं वचः शक्यसि चेद् यथाव- न्निशम्य सर्वं प्रतिपत्तुमेव । यशः परं प्राप्स्यसि जीवलोके भयं न चामुत्र न चेह तेऽस्ति ॥ २० ॥ मेरी इस बातको सुनकर यदि आप सब ठीक-ठीक समझ सकेंगे तो इस मनुष्यलोकमें आपको महान् यश प्राप्त होगा और इहलोक तथा परलोकमें आपके लिये भय नहीं रहेगा ॥ २० ॥ आत्मा नदी भारत पुण्यतीर्था सत्योदका धृतिकूला दयोर्मिः । तस्यां स्नातः पूयते पुण्यकर्मा पुण्यो ह्यात्मा नित्यमलोभ एव ॥ २१ ॥ भारत! यह जीवात्मा एक नदी है। इसमें पुण्य ही तीर्थ है। सत्यस्वरूप परमात्मासे इसका उद्गम हुआ है। धैर्य ही इसके किनारे हैं। दया इसकी लहरें हैं। पुण्यकर्म करनेवाला मनुष्य इसमें स्नान करके पवित्र होता है; क्योंकि लोभरहित आत्मा सदा पवित्र ही है ॥ २१ ॥ कामक्रोधग्राहवतीं पञ्चेन्द्रियजलां नदीम् । नावं धृतिमयीं कृत्वा जन्मदुर्गाणि संतर ॥ २२ ॥