महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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श्रीसनत्सुजात और महाराज धृतराष्ट्र
वैशम्पायन उवाच
चिन्तयामास विदुरस्तमृषिं शंसितव्रतम् । स च तच्चिन्तितं ज्ञात्वा दर्शयामास भारत ॥ ८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर विदुरजीने उत्तम व्रतवाले उन सनातन ऋषिका स्मरण किया। उन्होंने भी यह जानकर कि विदुर मेरा स्मरण कर रहे हैं, प्रत्यक्ष दर्शन दिया ॥ ८ ॥
स चैनं प्रतिजग्राह विधिदृष्टेन कर्मणा । सुखोपविष्टं विश्रान्तमथैनं विदुरोऽब्रवीत् ॥ ९ ॥
विदुरने शास्त्रोक्त विधिसे पाद्य, अर्घ्य एवं मधुपर्क आदि अर्पण करके उनका स्वागत किया। इसके बाद जब वे सुखपूर्वक बैठकर विश्राम करने लगे, तब विदुरने उनसे कहा— ॥ ९ ॥
भगवन् संशयः कश्चिद् धृतराष्ट्रस्य मानसः । यो न शक्यो मया वक्तुं त्वमस्मै वक्तुमर्हसि ॥ १० ॥