भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 347

यमं त्वेके मृत्युमतोऽन्यमाहु- रात्मावसन्नममृतं ब्रह्मचर्यम् । पितृलोके राज्यमनुशास्ति देवः शिवः शिवानामाशिवोऽशिवानाम् ॥ ६ ॥ कुछ लोग इस प्रमादसे भिन्न 'यम' को मृत्यु कहते हैं और हृदयसे दृढ़तापूर्वक पालन किये हुए ब्रह्मचर्यको ही अमृत मानते हैं। यमदेव पितृलोकमें राज्य-शासन करते हैं। वे पुण्यात्माओंके लिये मंगलमय और पापियोंके लिये अमंगलमय हैं ॥ ६ ॥

अस्यादेशान्निःसरते नराणां क्रोधः प्रमादो लोभरूपश्च मृत्युः । अहंगतेनैव चरन् विमार्गान् न चात्मनो योगमुपैति कश्चित् ॥ ७ ॥ इन यमकी आज्ञासे ही क्रोध, प्रमाद और लोभरूपी मृत्यु मनुष्योंके विनाशमें प्रवृत्त होती है। अहंकारके वशीभूत होकर विपरीत मार्गपर चलता हुआ कोई भी मनुष्य परमात्माका साक्षात्कार नहीं कर पाता ॥ ७ ॥

ते मोहितास्तद्वशे वर्तमाना इतः प्रेतास्तत्र पुनः पतन्ति । ततस्तान् देवा अनुविप्लवन्ते अतो मृत्युर्मरणाख्यामुपैति ॥ ८ ॥ मनुष्य (क्रोध, प्रमाद और लोभसे) मोहित होकर अहंकारके अधीन हो इस लोकसे जाकर पुनः-पुनः जन्म-मरणके चक्करमें पड़ते हैं। मरनेके बाद उनके मन, इन्द्रिय और प्राण भी साथ जाते हैं। शरीरसे प्राणरूपी इन्द्रियोंका वियोग होनेके कारण मृत्यु 'मरण' संज्ञाको प्राप्त होती है ॥ ८ ॥

कर्मोदये कर्मफलानुरागा- स्तत्रानुयान्ति न तरन्ति मृत्युम् । सदर्थयोगानवगमात् समन्तात् प्रवर्तते भोगयोगेन देही ॥ ९ ॥ प्रारब्ध कर्मका उदय होनेपर कर्मके फलमें आसक्ति रखनेवाले लोग (देहत्यागके पश्चात्) परलोकका अनुगमन करते हैं; इसीलिये वे मृत्युको पार नहीं कर पाते। देहाभिमानी जीव परमात्मसाक्षात्कारके उपायको न जाननेसे विषयोंके उपभोगके कारण सब ओर (नाना प्रकारकी योनियोंमें) भटकता रहता है ॥ ९ ॥

तद् वै महामोहनमिन्द्रियाणां मिथ्यार्थयोगस्य गतिर्हि नित्या । मिथ्यार्थयोगाभिहतान्तरात्मा